CHHATTISGARHI

   छत्‍तीसगढ़ी

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    छत्‍तीसगढ़

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छत्तीसगढ़ी का मानकीकरण क्यों और कैसे?

प्रो. चित्तरंजन कर

प्रत्येक भाषा  बोली व्यवहार में विविधरूपी या विषमरूपी होती है। जो भाषा जितने व्यापक क्षेत्र में व्यवहत होती है उस में उतनी ही अधिक विविधता होती है, संप्रेषण की दृष्टि से जो उसकी जीवंतता का प्रमाण है। यह उल्लेखनीय है कि भाषागत यह विविधता उस भाषा भाषी समाज में बाधक नहीं होती, जितनी दो भिन्न-भिन्न भाषाभाषियों के लिए होती है।
भाषा और बोली मूलत: समानार्थी होते हुए भी तकनीकी एवं व्यावहारिक दृष्टि से इसलिए भिन्न हैं कि भाषा का व्यवहार-क्षेत्र अत्यन्त व्यापक होता है, जबकि बोली का व्यवहार-क्षेत्र सीमित उदाहरणार्थ- खड़ी बोली से विकसित हिंदी भाषा आज खड़ी बोली क्षेत्र के अलावा अन्य प्रांतों एंव देशों में विविध प्रयोजनों के लिए व्यवहृत होकर उत्तरोत्तर विकसित होती जा रही है। जबकि खड़ी बोली आज भी अपने ही क्षेत्र में विद्यमान है। तात्पर्य यह है कि भाषा का दायित्व बोली की तुलना में अधिक है, जिसे सामान्य बोलचाल के अलावा शैक्षिक, प्रशासनिक, साहित्यिक, व्यावसायिक, एवं जनसंचार-संबंधी प्रयोजनो को भी निभाना होता है। भूमंडलीकरण की धारणा के  मूल में अंतरभाषिक (अनुवाद) संवाद है, जिसके सफल निर्वाह के लिए भाषा में मानकीकरण एवं आधुनिकीकरण को प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है।
मानकीकरण क्या है। मानकीकरण का शाब्दिक अर्थ है- जो मानक नहीं है, उसे मानक बनाने को प्रक्रिया(वैसे  ही जैसे जो शुध्द नहीं है, उसे शुध्द करने की प्रक्रिया शुध्दीकरण कहलाती है।) इस दृष्टि से विचार करने पर प्रतीत होता है। कि यह कार्य कदापि संभव नहीं है, क्योंकि प्रत्येक भाषा  बोली में कई मानक मूलत: विद्मान होते हैं, यथा क्षेत्रीय, वर्गीय, व्यावसायिक, आदि। यदि स्थूल रूप से किसी एक मानक का चयन कर लिया जाता है, तो अन्य मानकों के प्रयोक्ताओं की अवमानना होती है, जो उचित नहीं है। अत: मानकीकरण का युक्तिसंगत क्रियान्वयन विविधता में एकता ढूँढने के प्रयास से संभव है, जिसमें वैज्ञानिकता हो। वैज्ञानिकता से तात्पर्य है- तार्किकता, वस्तुनिष्ठता, रचनात्मकता, मितव्ययिता, जिसके के लिए छत्तीसगढ़ी या किसी की भी भाषा  बोली की सर्वसमावेशी अभिरचनाओं (साँचों) का विधिवत आकलन, विवेचन विश्लेषण अनिवार्य है।
मानक छत्तीसगढ़ी का मतलब शुध्द छत्तीसगढ़ी कदापि नहीं समझना चाहिए, क्योंकि प्रकृत भाषा एक बड़ी नदी की तरह होती है। जिसमें छोटी-बड़ी अन्य नदियाँ मिलकर तद्रूप हो जाती है, इस दृष्टि से कोई भी भाषा पूर्णत: शुध्दता का दावा नहीं कर सकती। छत्तीसगढ़ी में संस्कृत, हिन्दी, ऍंग्रेजी, अरबी, फारसी, मराठी, उड़िया तथा विभिन्न बोलियों से कितने शब्दों तथा मुहावरों का समावेश हुआ है यह स्वतंत्र शेभ का विषय है।
राजभाषा क्या है? वह राज-काज की भाषा है, जिसे शासकीय अर्थशासकीय, स्वशासी एवं अशासकीय कार्यालयों में शिक्षण-माध्यम में, पत्रकारिता तथा रेडियो, दूरदर्शन आदि अन्य जनसंचार-माध्यमों में, विज्ञापन में, साहित्य में, अंतर-भाषिक संवाद (अनुवाद) में व्यवहृत देखा जा सकता है। ऍंग्रेजी में राजभाषा को ऑफिशियल लैंग्वेज कहा जाता है। लगता है। कार्यालयीन भाषा उसी का शाब्दिक अनुवाद है, जो राजभाषा का पर्याय नहीं हो सकता। राजभाषा के रूप में छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण की आवश्यकता स्वयमेव सिध्द हो जाती है।
छत्तीसगढ़ी का व्यवहार-क्षेत्र बहुत व्यापक है। भौगोलिक दृष्टि से छत्तीसगढ़ी के क्षेत्रीय रूपों को अनेक वर्गों  में रखा जा सकता है, यथा-(1) रायपुर-दुर्ग (2) राजनाँदगाँव-डोंगरगढ़-खैरागढ़ (3) कवर्धा-बेमेतरा-सिमगा (4) बिलासपुर-चाँपा-कोरबा (5) मुँगेली-तखतपुर (6) रायगढ़-सारंगढ़-सराईपाली (7) काँकेर-कोंडागाँव-जगदलपुर (8) सरगुजा-अंबिकापुर आदि।
क्षेत्रीय विविधता के अलावा सामाजिक आर्थिक स्तरों पर भी छत्तीसगढ़ी के अनेक रूप प्रचलित हैं। जैसे उच्च शिक्षित एवं संपन्न वर्ग के लोगों की छत्तीसगढ़ी में हिंदीपन के अलावा ऍंग्रेजी शब्दों तथा मुहावरों, पदों, वाक्याशों का प्रयोग मिलता है, जैसे ओ माइ गॉड का कर डारे तैं, तोर से ए काम हो सकही, मो ला डाउट हे। मध्यमवर्गी एवं श्रमजीवी लोगों की छत्तीसगढ़ी में सहजता, सरलता, तरलता होती है, जिसमें अन्य भाषा के शब्द तद्भव रूप में आते हैं। जैसे- ऍंग्रेजी के टेसन, रेडुओ, फिलिम, सिंघल, टिकस, रेलवाही बलफ, एकसरा आदि।
तात्पर्य यह है कि छत्तीसगढ़ी पर सीमावर्ती भाषाओं, बोलियों का प्रभाव शिक्षा एवं व्यवसाय का प्रभाव, व्यक्ति की मानसिकता का प्रभाव देखा जा सकता है, जिसे शैलीगत प्रभाव कह सकते हैं। इस विविधता में एकता की तलाश कैसे की जाए कि वह सर्वमान्य हो जाए, क्योंकि भाषा के लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व हर भाषा-भाषी के ऊपर है। भाषा में एक ओर लोक है, तो दूसरी ओर तंत्र है। यह तंत्र स्वतंत्रता की अनुमति तो देता है, परंतु स्वच्छंदता उसे कदापि स्वीकार्य नहीं है। मानकीकरण का संबंध इसी तंत्र से है, जो निस्संदेह भाषा का व्याकरण है तथा जो भाषा या बोली की मूल प्रकृति ही है। बाहर से आरोपित नहीं। व्याकरण वस्तुत: भाषा का सामान्यीकरण है, जिसे बच्चे घर पर बड़ो द्वारा बार-बार प्रयुक्त वाक्यों या उक्तियों को सुनकर स्वत: आत्मसात कर लेते है।
भाषा की अस्मिता व्याकरण और शब्दकोश से प्रकट होती है। यह ज्ञातब्य है कि शब्द-रचना में व्याकरण ही नियामक होता है, अत: जब हम मानकीकरण की चर्चा करते हैं, तब वह विशेषत: व्याकरण से संबंधित होता है। क्योंकि शब्द तो विभिन्न स्त्रोतों से आते रहते है। व्याकरण कभी आहत नहीं होता यथा ''तैं अपन सँगवारी ला मेकाहारा म एडमिट करवा दे।'' इसके विपरीत ''ऑफ कोर्स तैं स्लोली जात रहे अउ में फास्ट स्पीड मा रहें।'' जैसे प्रयोग को छत्तीसगढ़ी की पाचन-क्षमता शायद ही अभी बरदाश्त कर पाए।
भाषा में उच्चारण, वर्तनी में एवं व्याकरण की एकरूपता सदैव स्पृहणीय रही है। भिन्न-भिन्न वर्गों या क्षेत्रों के लोगों के बोलने के लहजों को बदलना या सुधारना कठिन है, परंतु लेखन में एकरूपता लाई जा सकती है। जिसके दो विकल्प हो सकते हैं। प्रथम व्याकरण की एकरूपता सर्वत्र बनी रहे द्वितीय जो व्यक्ति जिस रूप को चुनता है, उस का निर्वाह आद्यंत करे, जैसे 'जाथौं' लिखे तो सर्वत्र वही रहे, न की कहीं 'जाथौं', कहीं 'जाथँव', कहीं 'जाथौं', कही 'जात हौं,' तो कही 'जात हों'। यह सच है कि इस रूपात्मक विविधिता से संप्रेषण में बाधा नहीं होती और न ही कोई रूप सही है या अन्य रूप गलत, परंतु मितव्ययिता की दृष्टि से तथा तार्किकता का आधार लेते हुए। जाथौं रूप वरेण्य प्रतीत होता है। कतिपय व्याकरणित शब्दों के लिए क्षेत्रीय विविधता मिलती है, जैसे अंग, अंगत, लंग, कती, कोती, डहर, तरफ आदि 'की ओर' के वाचक हैं, जिन्हें परस्पर समानार्थी कहना उचित है।
छत्तीसगढ़ी अथवा किसी भी भाषा का मानकीकरण कठिन तो है, परंतु असंभव नहीं और न ही यह कोई ऐसी समस्या है जिस के लिए विद्वानों को किंकर्तव्यविमूढ़ होना पड़े। किंकर्तव्यविमूढ़ता अकर्मण्यता-जन्य कायरता है, प्रयास की सक्रियता वीरता है, और सफलता प्रगति या उन्नति की निरंतरता है। छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण के लिए उस के सभी क्षेत्रीय एवं वर्गीय रूपों का आकलन-विवेचन सामूहिक उपक्रम से सुकर हो सकता है तथा व्यक्तिगत आग्रत पूर्वाग्रह दुराग्रह से रहित निष्कर्ष प्राप्त हो सकता है। मानकीकृत छत्तीसगढ़ी ही उन अन्य भाषाभाषियों के लिए आधार बनेगी, जो छत्तीसगढ़ी बोलना, लिखना, पढ़ना, और समझना चाहते हैं। भाषा अथवा राजभाषा के रूप में छत्तीसगढ़ का विकास छत्तीसगढ़ की अन्य बोलियों के आधार भूत शब्दों और मुहावरों के आदान से सरलता-पूर्वक उत्तरोत्तर होगा, उसी तरह जैसे हमें ऍंग्रेजों जैसी भाषा से भी शब्द या मुहावरे लेने में संकोच नहीं होता।
छत्तीसगढ़ी का मानकीकृत लेखन निम्नानुसार प्रस्तावित है, जिसमें तार्किकता, मितव्ययिता, लोच का आधार अपनाया गया है (द्रष्टव्य-नंदकिशोर तिवारी 'लोकाक्षर', चितरंजन कर एवं सुधीर शर्मा, 'बोलचाल की छत्तीसगढ़ी' रमेशचन्द्र महरोत्रा 'छत्तीसगढ़ी लेखन का मानकीकरण')
छत्तीसगढ़ी वर्णमाला
स्वर :   अ अ आ आ इ ई उ ऊ
ए ऍ ऐ ओ औ, अनुनासिता (चंद्रबिंदु)
व्यंजन :        क् ख् ग् घ्
च् छ् ज् झ्र
ट् ठ् ड् ढ् ड् ढ़्
त् थ् द् ध् न् न्ह्
प् फ् ब् भ् म् म्ह्
य् र् ल् ल्ह् व्
स् ह्
अनुस्वार
रूप विधान
पुरुष                  एक वचन           बहुवचन
उत्तम                  मैं जाऔं            हम जान
मध्यम                तैं जा              तुमन जाऔ
अन्य                 ओ जो             ओमन जाएँ
पुरुष                  एक वचन           बहुवचन
उत्तम                  मैं जातें             तुम जातौ
मध्यम                ओ जातिस          ओम जातिन
अन्य                 ओ जातिस          ओमन जातिन

पुरुष                  एक वचन           बहुवचन
उत्तम                  मैं जाहौं             हम जाबौ
मध्यम                जाबे               तुमन जाहौ
अन्य                

पुरुष                  एक वचन           बहुवचन
उत्तम                  मैं गें               हमन गेन
मध्यम                तैं गे               तुमन गयौ
अन्य                 जो गिस            ओम गिन

पुरुष                  एक वचन           बहुवचन
उत्तम                  मैं जाथौं            हमन जाथन
मध्यम                तैं जाथस           तुमन जाथौ
अन्य                 ओ जाथे            ओमन जाथें
पुरुष                  एक वचन           बहुवचन
उत्तम                  मैं हौं              हमन हन
मध्यम                तैं हस              तुमन हौ
अन्य                 ओ हे              ओमन हें

विकल्पन : प्रकृति भाषा में विकल्पन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो उसकी व्यापकता और ीजवंतता का प्रमाण है। छत्तीसगढ़ी में निम्नांकित क्षेत्रीय वर्गीय विकल्पन अर्थात् रूप विधिता द्रष्टव्य है-
मैं                    में, मँय
तैं                    तें, तँय
ओ                   वो
हमन                 हम मन, हामन
तुमन                 तुम मन, तूमन, तूँ
ओमन                वोमन, ऊमन
एमन                 ईमन, येमन
जाऔं                 जाँव, जावौं, जावँव
जान                  जावन

मानकीकृत             विकल्पन
आऔ                 जावौ, जावव, जावा
जातें                  जातेंव
जाते                  जातेस
जातौ                  जातेव
गें                    गैं, गँय
गेन                   गएन, गयेन, गैन
गे                    गै
गयौ                  गएव, गयेव, गेव
गिस                  गइस
गिन                  गइन
जाथौं                  जाथँव, जाथों
जाथे                  जाथै, जाथय
हौं                    हँव, हाँव औ, ऑंव, ऍंव
हन                   हवन
हस                   हवस
हे                    है, हय, हवय
हें                    हैं, हवँ, हावँय, एँ
जाहौं                  जाहों, जाहँव, जाहाँ, जइहौं,जैहों
जाबो                  जाबोन
जाहौ                  जाहव, जाहा, जइहौ
जाही                  जाहै, जाहय
जाहीं                  जाहंय, जाहैं, जइहैं
एकर                  एखर, इखर, इकर
ओकर                 खोखर, वोखर, ऊखर, उकर
एमन के               ईमन के, इँकर, इनकर, इँखर
ओमन के              वोमन के, उनकर, उँकर, ऊँखर
ऐसन                 अइसन, येसन, ेसे
वैसन                 ओइसन, वइसन, वैसे
कैसन                 कइसन, केस, कैसे
ला                   ल
मा                   म, में
हा                    ह, हर
कर                   करा
झन (जन)             झिन, झी
झन (मत)             झिन
ठन                   ठिन, ठो, ठी
कौन                  कउन, कोन
छत्तीसगढ़ी की मानकीकृत वर्णमाला को ध्यान में रखते हुए कतिपय संज्ञा-शब्दों की वर्तनी के उदाहरण इस प्रकार है-
अकास, अगास (आकाश), अग्यान (अज्ञान), अमरित (अमृत), अस्वनी (अश्विनी), आसरमआस्रम (आश्रम), आस (आशा), इतवार (आदित्यवार), इरखा र्(ईष्या), ईस्वर (ईश्वर), उच्चारन (उच्चारण), कक्छा (कक्षा), कारन (कारण), किरपाक्रिपा (कृपा), गुन (गुण), घ्रिनाघिन (घृणा), क्षत्री (छत्रिय) जग्य (यज्ञ), जमुना (यमुना), जस (यश), जिग्यासा (जिज्ञासा), तिरिथ (तीर्थ), दिसा (दिशा), द्रिस्टिद्रिस्टी (दृष्टि), दीच (दीक्षा), देस (देश), धरम (धर्म), निपुन (निपुण), निस्काम (निष्काम), परिच्छा (परीक्षा) भासा (भाषा), मिरगी (मृगी), रितु (ऋतु), रिन (ऋण), लछमी (लक्ष्मी), संकर (शंकर), सेसनाग (शेषनाग), सिरी (श्री) सुआंगस्वांग (स्वांग), सुभास (सुभाष) इत्यादि ।

 

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