CHHATTISGARHI

   छत्‍तीसगढ़ी

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    छत्‍तीसगढ़

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छत्तीसगढ़ी भासा : उपेच्छा अऊ अपेक्छा

-नन्दकिशोर तिवारी

हमर ये समय ल, जेमा हम जीयत हन जमों ला भुला जाय  (स्मृति भंग) के समय कहे जा रहे हे। ए समय के मझ म बइठ के मैं सोचत हंव के भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अपन आज ल हमर काल बर सौंपे के बात कहत रहिन तउन ह छत्तीसगढ़ के तात्कालीन साहित्यकार, मन बर फालतू गोठ असन रहिस। काबर के उन अपन आत्म-मुग्ध व्यक्तित्व के संरचना खातिर अपन दूध के भासा म रचना नइ करके हिन्दी बर अपन कृतित्व ल समरपित कर दिहिन । उही समय म भोजपुरी, मैथिली, अवधी भासा मन म बड़े-बड़े लेखक मन के नांव पढ़े म मिल जाथे। ये हा उल्लेख करे के बात आय के नागार्जुन ल साहित्य एकेडेमी के एवार्ड मैथिली भासा के कवि के रूप में नवाजे गीस। छत्तीसगढ़ म इंकर ले कम हैसियत के कोनों साहित्य कार नइ रहिन। श्री पदुमलाल पुन्ना लाल बख्शी ले लेके पं. मुकुटधर पांडे तक। अइसनहे इक ठोंक उदाहरन दिहे जा सकत हे। बात के बतक्का असन कहे म इही कहे जा सकते हें, इंकर आत्ममुग्धता, जश्न आज ले छत्तीसगढ़ी के साहित्यकार मन म देके ल मिलथे, तेकर कारन छत्तीसगढ़ी ल वो सम्मान नइ मिल सकिस, जुन बोला बहुत पहिली मिल जाना रहिस।
ये करा तर्क करे जा सकत है के रास्ट्र के रास्ट्रवादी लहर माने रास्ट्र अउरास्ट्र भासा के जरूरत ज्यादा मायने रखत रहिस। हमर पुरखा मन अपन घर के भासा ले ज्यादा रास्ट्र के रास्ट्र भासा बर अपन सर्वस्व जोंक दिहिन। इंकर करा पूछे जा सकत हे के कबीर साहब घलो अपने घर ल दांव म लगादिे रहिस। घर फूंके जो अपना कहय।  फेर का अपन घर-परिवार के चिंता वोला नइ रहिस ? काबर जुलाहागिरी करत रहिस ?  काबर अपन घर परिवार ल नइ त्यागिस ? कबीर के जीवन प्रसंग न सनात जुन्नटहा मनखे मन बताथें के एक पइत एक झन संसारी कबीर साहब करा आ के इंकर घर परिवार म रचे-बसे प्रेम के अरथ जानना चाहिस। कबीर साहब अपन परानी ल ठाढ़ मंझनिया कहिस देक तो दिन बुड़ गय, दिया ल बार के लान। वोकर परानी दिया ल बार के लान के रख दिहिस। थोरकुन बेरा जाय के बाद कबीर साहब दिया ल ले जाय बर कहिस । वोकर परानी वइसनेहच करिस। कहे के मतलब ये हे के घर एला कहिथे। घर म प्रेम विस्वास ह ही ईस्वर के प्रति प्रेम विस्वास ल आधार दे थे। ये ला नइ कहय के आने वाला पीढ़ी प्रस्न के बौछार लगा दय अड जुन्ना पीढ़ी अपन सफाई देत फिरय । राम के प्रति कबीर साहब के प्रेम अउ विस्वास अडिग रहिस तब घर के प्रति प्रेम अउ विस्वास वोतके मजबूत रहिस। कहे के मतलब ये के घर, घर के बाद गांव गांव के बाद प्रदेस अउ प्रदेस के सम्पन्नता ह रास्ट्र ल सम्पन्न बनाथे। घर दरिद्र होंगे तब रास्ट्र के दरिद्र होना वोकर नियति बन जाथे। हमर जुन्नटहा साहित्यकार मन के रास्ट्र प्रेम घर ल फूँक के भुर्री तापे असन लागथे। परिणाम हम सामने स्पस्ट हे के साहित्य के इतिहास लिखइया आत्ममुग्ध साहित्यकार मन झूठ के अउ निहायत झूठ के सहारा ले के छत्तीसगढ़ी मनुस्य ल एक घनघोर अंधियार म आज ले ठकेलत हें।
भारतीय स्वतंत्रता संग्रामके सेनानी मन स्वदेसी के बात करंय। वोमन जानत रहिन के भारतीय मनुस्य न अपन धरम, जात, रहन-सहन अउ भासा उप्पर गर्व करे के पाठ सिखाय म ही स्वराज के कल्पना ह रूप पा सकत हे। इही सेती उनमन खादी, ग्राम-उद्योग अउ हिन्दी ल स्वतंत्रता आन्दोलन के औजार बनाइन। हिन्दी भासा ल औजार बनाय के मतलब अंग्रेजी विरोध बिलकुल नइ रहिस। महात्मा गांधी के अनुसार मैं नहीं चाहता कि मेरा घर चारों ओर से प्राचीरों से घिरा हुआ हो और मेरी खिड़कियाँ बंद हों। मैं चाहता हूँ कि मेरे घर में सभी देशों की संस्कृतियों का बिना रोक-थाम प्रवेश हों। लेकिन मैं नहीं चाहता कि कोई भी संस्कृति मुझे अपनी जड़ी से उखाड़ दे। मैं दूसरे के घरों में घुसपैठिए, या अपने घर में गुलाम की तरह नहीं रहना चाहता दुनिया के ग्यान, विग्यान, भासा, साहित्य अउ संस्कृति मनुस्य के व्यक्तित्व ल संवार थे। एकर मतलब वोकर स्वतंत्रता हे हनन इनई होय। फेर का करे जाय, इहाँ उलटेच बात होत हे। आयातित संस्कृति अउ भासा इहां के मनखे मन उप्पर हावी होत जात हे। अत: सलिला अरपा म छठ-घाट बनगे। बिलासपुर के इतिहास के साक्छीपचरीघाट के रहवइया मन ल मरनी, हरनी नहावन के इंतजाम नगर निगम के किराया के पानी (टेंकर) म निपटाय बर पर थे। कुल मिला के आयातित संस्कृति अउ भासा इहां के मनखे मनन के उपर हावी होत जात हे। एक किसिमि के मानसक भर नहीं सामाजिक, सांस्कृतिक अउ आर्थिक सोसन के दायरा बढ़त जात हे। परतिंगा लेना हे तब भाई डॉ. परदेशीराम वर्मा के झन भरमा सरमा जी कहानी ल पढ़ लेवव।
छत्तीसगढ़ के इतिहास म जाय म मालूम होथे के एक लम्बा समय तक छत्तीसगढ़ गुलाम रहे हे। ये गुलामी के दौर म घलो आन-बान-सान के जीवित रहना वोकर जुझारू जिजीविसा के कथा कहिथे भारत के स्वतंत्रता संग्राम म स्वभासा के उन्नति के राग अलापे के विपरीत छत्तीसगढ़ी भासा के घोर विरोध अउ अपमान छत्तीसगढ़ी के जिजीविसा ल धीरे-धीरे नुकसान पहुंचात गइस। ये तथ्य के गवहा छत्तीसगढ़ी रचनाकार मन के सघर्ष कथा दे थे। भारतीय स्वतंत्रता संगराम म छत्तीसगढ़ के नेतृत्व गैर छत्तीसगढ़ी भासी मन ल हमर छत्तीसगढ़िया म सौप दिहनि। परिनाम स्वरूप स्वतंत्रता संग्राम अउ वोकर बाद छत्तीसगढ़ी मनुस्य के संग संवाद के भासा छत्तीसगढ़ी नइ हो के विजीतीय भासा होंगे। विजातीय भासी नेतृत्व अउ इंकर सिपहासालर मन के द्वारा उपेक्छित छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़ के मनुस्य हीन भावन ले ग्रस्त अपन भासा ले विमुख होत, गइस, अउ होत जात हे।
पुरातन काल ले चल आत भारतीय सिक्छा व्यवस्था मनुस्य ल मनुस्यत्व ले संस्कारित करके समाज ल सौंप देत रहिस। वोहा समाज के एक इकाई बन के समाज के बीच रहय। अंगरेजी राज आय के बाद समाज म बढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाग के हाना चलन म आगे। ये नवाबी ह समाज के एक मजबूत आर्थिक इकाई बनाय के जमा मनुस्य ल स्वतंत्र इकाई के रूप म प्रतिस्ठित करिस। इही व्यवस्था अबले पोठात जात हे। हमर वर्तमान सिक्छा व्यवस्था रोजी-रोटी तलासे के रद्दा बनगे। अइसन रद्दा जेमा पढ़े-लिखे युवक छोटे ले नौकरी के फिकर म लग के सड़क नापत हे। हमर सामाजिक सोच घलो इसी कतर घिन्नी म घुमरत हे । उच्छ सिक्छा बर भासा बीच म आथे। उच्च सिक्छा माने अंग्रेजी अच्छा ग्यान। आज अंग्रेजी भासा कोनो किसिम के नौकरी बर जबदस्त माध्यम बन गय हे । एकखर सोज्झ असर हम छत्तीसगढ़ सरकार के भासा नीति म देखत  हन, जेमा मिडिल स्कूल ले अगंरेजी भासा से सिक्छा न अनिवार्य बनाय गय हे। ये हा समय अउ बजार के मांग आय। अउ आज के जमाना म उही भासा, उही ग्यान चली जउन बजार के मांग के अनुरूप हो ही । फेर हमला समझना परही के अऊन बजार के इसारा म बजार के भासा कती हम जात हन, वोमा हमर भासा भर नइ जा ही, हमर संस्कृति, आजार विचार जमों जाही। हम सफ्फा देखत हन के आजकल बजार वेलेटाइन डे, मदर्स डे, फादर्स डे मनाय के रिवाज चलात हे, कभू हम सोचे हन के का हो ही हमर भोजरी, जंवारा, महापरसादी के । का होही हमर पितर-पाख के।
ये मेर मोला एक ठन घटना के सुरता आत हे। मैं डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय सागर म कुल सचिव पदस्थ होयेव। उहाँ मनोविग्यान विभाग म एक झन व्याख्याता तीन साल ले नौकरी करत रहिस। वोकर वेतन निर्धारित नइ होय रहिस। मोर तीर आ के वो हा अपन दुख ल बताइस। सरी प्रकरन ल देखे म ग्यात होइस के वोकर अंतिम वेतन प्रमान पत्र अउ सेवा पुस्तिका नइ आय हे सागर विश्वविद्यालय के सेवा म आय के पहिली वो महोदय पंजाब सरकार के मुलाजिम रहिस। जबर्दस्त लिखा पढ़ी करे म ले दे के अंतिम वेतन प्रमान पत्र अउ सेवा पुस्तिका आइस। वोमा अंगरेजी म लिखाय रहय गुरुमुखी भासा नई सीखे के सेती वेतन वृध्दि, स्थायीकरण, पदोन्नति वंचित करत सेवा सामस। वोकर नियुक्ति पत्र म छै महीना के भीतर गुरुमुखी सीखना अनिवार्य कर दिए गय रहिस। अउ, हमर छत्तीसगढ़ म बाहिरी आदमी आ-आ के अपन भासा, अपन देसराज के संस्कृति, कर्मकाण्ड, के डंदा चलात हें अउ छत्तीसगढ़िया मनखे बक्क खाय सबला सहत हे। सहना वोकर मजबूरी बन गे हे काबर के हमर छत्तीसगढ़ के माई मंत्री छत्तीसगढ़ के विकास चाहत हव तब अइसनहा चाल ले सहे पर परिही कहिके हमरेच हंसी उड़ा के चल दे थे । अउ हम दांत निपोरत अपन दुर्दसा के विकास ल देखत रहि जाथन।
छत्तीसगढ़ी मनुस्य के अड़बड़ सोसन होत हे। सामाजिक आथि4क सोसन ल हम मन अपन ऑंखी म देखत हन । मैं काला कहंव । एक रंगा ल के दू रंगा ला, के तीन रंगाल। सब के हतेली धन रूपी परा म मसकाय हे। धन म इंकर तन, मन अतका डूब चुके हे के तन अउ मन धन म बदल के धन हो गे हे । तन मन अउ धन दूनो मिलके छत्तीसगढ़िया मनखे ल, इंकर खेत खार ले अउ कहांतक कही, बस्तर के आदिवासी मन ल, उकर घर बार ले निकार के गरुआ-भैंसा असन सिविर नाव के कोठा म धांध दि हे हे। एक कती सरकार कथे के वोहा इंकर आजादी के लड़ाइ लड़त हे अउ दूसर कती सरकार करा लड़इया मन घला इंकरे आजादी के लड़ाई के भरोसा देवात हे। ये दूनों गोठ के होरा म बड़े-बड़े फेक्टरी स्थापित करत पूंजीपति अपन हाथ ल सेंकत हें। अउ कोठा म धंधाय बस्तरिहा मनखे दूनों के आजादी देवाय के लड़ाई म कबकाय न दीन के रहिगे हे न दुनिया के ।
येकर ले ज्यादा सोसन भावनात्मक स्तर म छत्तीसगढ़ी मनुस्य के हो रहे है। ये बात ल समझे बर हमला इतिहास डहरजाना परही। अंगरेज राज हिन्दुस्तान म स्थापत होइस। एक संगे-संग अंगरेज मन भारतीय वाग्डमय के अध्ययन सुरु करिन। उन मन उध्दोस करिन के भारत दुनिया के आध्यात्मिक गुरु आय। अध्यात्म, दर्सन म भारतीय मनुस्य, जाति अनुपमेय गय। ये बात बिलकुल अलग हे अउ कहे म आथे के ढाका के बारीक ले बारीक मलमल के कपड़ा बनवइया मन के हाथ कटे के बाद ये सोसन के चेहरा उजागर होसि। तब तक दांत हे तब चना नइए अउ चना हे तब दांत नइये के स्थिति म भारतीय मनुष्य पहुच गे रहिस ।
ठीक वइसनहे हालत छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़िहा मनखे के हे। छत्तीसगढ़ी भासा के जब बात निकलथे तब हतास करे बर छत्तीसगढ़ी के व्याकरण, मानक छत्तीसगढ़ी अउ छत्तीसगढ़ी लिपि जइसे प्रस्न उछाल दिये जाथे। अउ छत्तीसगढ़ी के विद्वानमन इही प्रस्न के उत्तर देत फिरत रथें अउ भासा के सवाल ल कइ साल के सूली म टांग दिये जाथे। छत्तीसगढ़िया के उत्तर के कोहों सुनवाईनइ होय, अउ वोही प्रस्न घेरी बेरी हम तीर उत्तर मांगे बर उठाय जाथे। बाहरी मनखे मन के ये सवाल हे तब दूसर कती हम मनखे याने छत्तीसगढ़िया विधान मन के छत्तीसगढ़िया मनखे के सोसन के तरीका बिलकुल अंगरेज मन असन हे। छत्तीसगढ़ राज बने के बाद बहुत झन (उद्) विद् जनम गे है। कोनो भासाविद है कोनो इतिहास विद तब कोनो पुरातत्व विदो अउ उवा-उवा के विद् । मन मन कभू छत्तीसगढ़ के माटी नदी-नरवा, पहाड़-पहाी, जंगल-घाटी, देवी देवता के जस उप्पर किसान किसानिन के कायिक, सुन्दरता के बरनन करथे। जस गाथे, तब कभू प्राचीन ले प्राचीनतम इतिहास संग छत्तीसगढ़ के ता जोर थे अउ छत्तीसगढ़ अउ छत्तीसगढ़ी ल महान ले महानतम घोषित करथें।
एकर एक दू ठो का कइ ठो ुदाहरन दिए जा सकत हे। राजनीति के उठाले छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया नइ त अमीर धरती के गरीब मनखे नी त अमीर धरती के गरीब मनखे नई त छत्तीसगढ़ के संत असन हम ह अपन छत्तीसगढ़ी प्रवास म छत्तीसगढ़ी म गोठियावय कहना कोन कर्त इसारा कर थे। राम छत्तीसगढ़ी बोलय एकर अरथ होइस के छत्तीसगढ़ी त्रेता युग ले चले आत भासा आय । ये बात के प्ररतिगा भासाविद् मन करा लेना चाही । इइसे म हमला छत्तीसगढ़ी के विद्वान मन ल धन्यवाद देना चाही के ओ न राम के जनम भूमि छत्तीसगढ़ ल नई बताइन । अइसनहा उन कहि सकत हिन का बर के माता कौसिल्या छत्तीसगढ़ के बेटी ए। छत्तीसगढ़ी समाज म बेटी के पहिलावेत लइका मैके म होथे । कौसिल्या के राम पहिलावत बेटा आय। परम्परा के अनुसार वोला इहें जनमना रहिस। कहूँ अइसनहा कहि देतिन तब छत्तीसगढ़ अयोध्या बन जातिस अउ मनखे के जीना हराम ।
ये करा बहर के भोला एक ठन छत्तीसगढ़ी लोक कथा के सुरता आत हे । कथा के अनुसार महादानी मोरध्वज के छत्तीसगढ़ म एक पइत एक झन चतुरा भिखमंगा आइस। सम्पन्न मनखे के घर दुआ ल देखिस तब वोकर मन म चोर हमागे। चोरी के नीयत म वोहर एक ठन कथा सुनाइस-

कथा कहंय कंथली
जरय पेट के अंतली
खेत म मिरगा मरे
कोइ खाता न पीता

संपन्न घर गोंसइयां खेत मं मरे मिरगा के बात सुनिस तब वोकर छाल ल पायेबर खेत कती दउड़िस । घर ल सुन्ना पा के भिखमंगा जमो जिनिस बारी ल डोहार डारिस। तइसने हाल हमर हे। हम अपन वर्तमान ले मसगूल मरे मिरगा के छाल बर भागतत हन। अतीत डहर हन अपनेच बड़ाई करत आत्मा मुग्धता के अंधियार म भटकत हन । इहां तक के हमर भासा बजार के अउ राजनीति जाल म फंस गे हे । भासा के ये तरा फंसना छत्तीसगढ़ी मनुस्य बर वोकर अस्तित्व के संकट पैदा कर दिये हे। भासा नंदाही तब छत्तीसगढ़िया के छत्तीसगढ़िया पन घलो समाप्त हो जा ही।
ऊपर के आलेख म अपन कथन के भूमिका बांधे के बाद मोर कहना हे के-
1. छत्तीसगढ़ी घर-परिवार म बातचीत के माध्यम छत्तीसगढ़ी भासा ही होय।
2. छत्तीसगढ़ी के चिंतक, अउ लेखक मन वास्तविक संसार, अपर आज के संसार ले जुड़ के सोंचय अउ लिखय अउ छत्तीसगढ़ी मनुष्य के भावनात्मक सोसन ले बाज आय।
3. छत्तीसगढ़ी मनुस्य छत्तीसगढ़ी भासा के पत्रिका, पुस्तक मन ल बिसा के पढ़य ।
4. छत्तीसगढ़ी सरकार, सरकार के अमला मन संग छत्तीसगढ़ी म बातचीत करय। जब बी जनगणना होय तेमा अपन भासा छत्तीसगढ़ी लिखावय।
5. मीडिया ल हमर राजनीतिग्य, नेता मन छत्तीसगढ़ी म साक्छात्कार देवय।
6.     छत्तीसगढ़ सरकार प्रायमरी सिक्छा ले हाइस्कूल के सिक्छा तक छत्तीसगढ़ी भासा के ग्यान, अध्ययन अध्यापन ल अनिवार्य बनावय।
7.     प्रायमरी मिडिल अउ माध्यमिक सिक्छा व्यवस्था में छत्तीसगढ़ी हिन्दी अंग्रेजी के भासा ग्यान अनिवार्य रूप से सामिल रहय।
8.     छत्तीसगढ़ सरकार के जमोच कर्मचारी अधिकारी मन के लिये छत्तीसगढ़ी भासा के ग्यान अनिवार्य बनावय। एकर  बर पं. सुन्दरलाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय छत्तीसगढ़, बिलासपुर एकठनविसेस पाठयक्रम के निर्धारण करय। पाठयक्रम डिप्लोमा कोर्स के 6 महीना के अवधि के रहय।
विश्वविद्यालय के पाठयक्रम म छत्तीसगढ़ी साहित्य के विविध संरचना के उच्च अध्ययन के व्यवस्था करय। पाठय सामग्री बर छत्तीसगढ़ ग्रंथ अकादमी ल समय सीमा निर्धारित करके जिम्मेदारी दिये जाए।

- रवीन्द्र नाथ टैगोर नगर, मुंगेली रोड बिलासपुर

 

 

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