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    छत्‍तीसगढ़

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छत्तीसगढ़ी दिवस पर वैचारिक संगोष्ठी संपन्न

छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए संघर्ष का संकल्प लिया गया
भिलाई, अगास दिया कार्यालय हुडको में 30 मार्च 2006 को छत्तीसगढ़ी दिवस के अवसर पर शिक्षाविद श्री तोरणसिंह ठाकुर की अध्यक्षता में वैचारिक कार्यक्रम हुआ । 30 मार्च 2001 को श्री डोमेन्द्र भेड़िया पूर्व विधायक के शासकीय संकल्प को छत्तीसगढ़ के विधानसभा ने पारित किया । अगासदिया के अध्यक्ष डॉ. परदेशीराम वर्मा प्रारंभिक उदबोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ी छत्तीसगढ़ के दो करोड़ लोगों की भाषा है। गांव के बच्चे आज भी प्रारंभिक दौर में गुरुजी से इसी भाषा में अक्षर ज्ञान कर पाते हैं। शास्त्रीय आधार पर तो हर भाषा बोली होती है । छत्तीसगढ़ी का व्याकरण 1890 में प्रकाशित हो गया था । छत्तीसगढ़ी एक समृध्द भाषा है। छत्तीसगढ़ के विश्वविद्यालयों में छत्तीसगढ़ी का एक पर्चा एम.ए. के लिए निर्धारित है । 2001 से आज तक भाषा के संदर्भ में सही पहल नहीं होने के कारण छत्तीसगढ़ी को उसका वाजिब हक नहीं मिला। प्रारंभ में धनेश्वर निर्मल एवं अभिषेक वर्मा ने अतिथियों का स्वागत किया ।
श्री जमुना प्रसाद कसार ने अपने वक्तव्य में कहा, भाषा का मसला हल करना जरुरी है। अपने पान्त में अपनी भाषा को दर्जा प्राप्त ने हो यह शर्मनाक स्थिति है।
उनकी बात को आगे बढ़ाते हुए रवि श्रीवास्तव ने छत्तीसगढ़ी में हो रहे विपुल लेखन पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ी में वगत छ: सौ वर्षों से लेखन का इतिहास तो सभी जानते हैं। धर्मदास के पद इसके प्रमाण हैं । लोग निरंतर लिखकर छत्तीसगढ़ी को समृध्द करते आये हैं। भाषा अपने विपुल साहित्य के दम पर दावा करती है इसीलिये छत्तीसगढ़ी को हक है कि उसे मान्यता मिले। कवि बसंत देखशमुख ने कहा कि भाषा के लिए संघर्ष करने का दौर आ गया है। जिस भाषा में छत्तीसगढ़ के सपूतों ने छत्तीसगढ़ की अस्मिता के लिये संघर्ष किया उस भाषा के सम्मान के लिए जरूरी लड़ाई लड़नी ही पड़ेगी। हमारी शालीनता को ही हमारी कमजोरी समझ ली जाती है। इसीलिए छत्तीसगढ़ियों को उसका वाजिब हक प्राय: नहीं मिलता ।

कलाकार विनायक अग्रवाल, महेशवर्मा, आर.डी.राव, ने भी इस अवसर पर भाषा के संदर्भ में विचार व्यक्त किया। आमदीनगर के प्रबुध्द नागरिक इस अवसर पर उपस्थित थे। भाषा के लिए सतत संघर्ष के संकल्प के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

 

 

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