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    छत्‍तीसगढ़

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छत्तीसगढ़ी दिवस पर भाषायी विमर्श

महासमुन्द, साहित्यकार आनंद पौराणिक के निवास पर आयोजित छत्तीसगढ़ी दिवस के भाषायी विमर्श में गत दिनों, स्थानीय छत्तीसगढ़ी रचनाकारों ने वैचारिक अभिव्यक्ति दी। छत्तीसगढ़ी के प्रतिनिधि कवि माखनलाल तम्बोली ने सर्वप्रथम मां सरस्वती के चित्र पर पुष्प हार चढ़ाया। विट्ठल राम साहू ने छत्तीसगढ़ी की पावन माटी की वन्दना मधुर स्वरों में प्रस्तुत किया। आस्था अध्यक्ष आनन्द तिवारी पौराणिक ने भाषायी विमर्श का श्रीगणेश करते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ी, दो करोड़ लोगों की आत्म-अभिव्यक्ति है। इसका शब्द भंडार विशाल है, व्याकरण पहले ही लिखा जा चुका है, साहित्य व संस्कृति समृध्द है। जनमत की मान्यता प्राप्त इस भाषा को संवैधानिक दर्जा मिलना आवश्यक है। छत्तीसगढ़ी राज्य में छत्तीसगढ़ी की उपेक्षा सोचनीय है ।


दयालाल चन्द्राकर ने कहा कि जिस प्रकार दिल्ली और मेरठ के आसपास की खड़ी बोली, समृध्द होकर हिन्दी भाषा बनी, उसी प्रकार छत्तीसगढ़ी अब पूर्ण समृध्द भाषा है। हरखराम पेन्दारिया का मानना था कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में पारित भाषायी-मान्यता सम्बन्धी तथ्यों का सम्मान न होना दुर्भाग्य ही है। व्ही.पी. सिंह ने कहा कि स्वभाषा की परगति ही सभी उन्नति की मूल है। हमें अपनी भाषा का प्रयोग अधिकाधिक करना चाहिए।


विट्ठल साहू ने कहा कि आज सभी भारतीय भाषाओं को अपसंस्कृति से बचाना जरूरी है। वरिष्ठ रचनाधर्मी माखनलाल तम्बोली ने कहा कि छत्तीसगढ़ी एक सुमधुर और अर्थपरक भाषा है। इसके साहित्य में माधुर्य, अभिव्यंजना और सम्प्रेषणीयता है। जन बोली ही विभाषा और फिर भाषा बनती है।

 

 

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