..... (जारी श्री भूपेश बघेल) :- अजय जी, आपके ही क्षेत्र हीरालाल काव्योपाध्याय ने छत्तीसगढ़ी की पहली व्याकरण की रचना की जो आज भी कोलकाता ने आज भी सुरक्षित है । उसमें अंग्रेजों ने शोध भी किया है । छत्तीसगढ़ी के अनेक शब्दकोश हैं, छत्तीसगढ़ी ने अनेक रचनाएं हैं । यहां के संतो-महात्माओं ने छत्तीसगढ़ी में अपने प्रवचन, संदेश दिए चाहे वह गुरूघासी दास जी हो या धनी धर्मदास जी हो जिन्होंने कबीर के पदों को छत्तीसगढ़ी में गाया है । हमारे संतों-महात्माओं ने छत्तीसगढ़ी भाषा को सम्मान दिया है ।
आज यह जन-जन की, दो करोड़ जनता की भाषा है । सभापति महोदय, इसलिए इसे पास होना ही चाहिए ।
मैं आपसे निवेदन करना चाहता हूँ और संविधान में भी इसकी व्यवस्था है । आप धारा- 345, 346 और 347 में देखें और हम इसको 347 के माध्यम से इस प्रस्ताव को लाए हैं । जिसमें है कि.. किसी प्रदेश के, किसी राज्य के जनसंख्या के किसी अनुभाग द्वारा बोली जाने वाली भाषा के संबंध में विशेष उपबंध यदि यह नियमित मांग किए जाने पर राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि किसी राज्य की जनसंख्या का पर्याप्त भाग यह चाहता है कि उसे द्वारा बोले जाने वाली भाषा को राज्य द्वारा मान्यता दी जाए । तो यह निर्देश दे सकेगा कि ऐसी भाषा को भी उस राज्य में सर्वत्र या उसके किसी भाग में ऐसे प्रयोजन के लिए जो वह निर्दिष्ट करे शासकीय मान्यता दी जाए। इसी धारा के तहत देश के अन्य राज्यों में उनकी भाषा को मान्यता मिली है ।
देखने में तो यह आ रहा है कि जो सात-आठ लाख की जनसंख्या में जो बोली बोलने वाले हैं उनको भी उनको भी भाषा की मान्यता मिली है। आप नार्थ-ईस्ट के अनेक राज्य में चले जाएं तो वहां पर जो छोटी जनसंख्या जिस भाषा का उपयोग करती है उनकी भाषा को भी मान्यता मिली है । तो छत्तीसगढ़ी भाषा को दो करोड़ से अधिक लोग बोलते हैं इसको मान्यता तो मिलनी ही चाहिए।
सभापति महोदय, ऐसा नहीं है कि छत्तीसगढ़ी में शोध नहीं हुए हैं । रविशंकर विश्वविद्यालय के जो पहले कुलपति बाबूराम सक्सेना जी थे उनके नेतृत्व में आदरणीय वाजपेयी जी जिन्होंने जी जिन्होंने इसमें पहला शोध किया, पी.एच.डी. की । यूनिवर्सिटी में पिछले तीन दशक से छत्तीसगढ़ को एक भाषा, सब्जेक्ट के रूप में पढ़ाया जा रहा है। तो हर स्थिति में, हर स्तर में छत्तीसगढ़ी यह सम्मान प्राप्त करने की हकदार है, इसे प्राप्त किया जाना चाहिए।
हम सबका दायित्व बनता है कि हम छत्तीसगढ़ी को भाषा के रूप में दर्जा दिलाने का अनुरोध केंद्र सरकार से करें। जिस प्रकार छत्तीसगढ़ राज्य के लिए दो बार संकल्प गया था और एक रास्ता और एक मार्ग प्रशस्त हुआ था उसी प्रकार से छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए भी हम सब सर्वानुमति से इसे सदन में पास करके छत्तीसगढ़ी को सम्मान दे । छत्तीसगढ़ी को सम्मान देना जैसे अपनी माता को सम्मान देना है । माननीय सभापति महोदय, आपने मुझे जो समय दिया उसके लिए धन्यवाद।