मातृभाषा के महत्ता के कोनो जोड़ नइये - जागेश्वर प्रसाद

जउन बोली भाखा अपन महतारी के मुख ले बच्चा दूध पीयत खेलत, फूदकत लोरी कहिनी सुनथे-सीकते ओही ल मातृभासा कहे जाथे। भले आदमी कतका न भासा के जानकार विद्वान हो जाय फेर ओमन मातृभासा नइ हो सकय। भले ओमन रास्ट्रीय, अंतर्रास्ट्रीय, अंतर-प्रांतीय अउ देव बासा हो सकथे फेर मातृभासा के कुर्सी न नइ पा सकय। साक्छरता अउ सिक्षा दीक्छा खातिर मातृभासा सबले जाद सहज, सरल, पोट्ठ अउ असरदार होथे, येखरे खातिर सबो सिक्छा सास्त्री रिसि मुनि भाषा वैग्यानिक अउ उच्चतम न्यायालय के घलो साफ तौर ले मानना हे कि प्रायमी स्कूल के पढ़ाई मातृभासा म ही होना चाही। काबर के मातृभासा के जरिया ले मिले सिक्छा दिल अउ दिमाग दूनो म सहजता वाले बेजोड़ संस्कार भरथे।

छत्तीसगढ़ के दू करोड़ अउ भारत वर्ष केढाई करोड़ लोगन के द्वारा छत्तीसगढ़ बोले अउ समझे जाथे। दू करोड़ ले ज्यादा छत्तीसगढ़िया लोगन के मातृभासा ही। अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार के मुताबिक छत्तीसगढ़ राज के 85 प्रतिशत जनता न घलो उनकर अधिकार मिलना बहुतेच जरूरी हवय। राज बने के याद छत्तीसगढ़ के पहली जरुररत है छत्तीसगढ़ी बोलना, लिखना पढ़ना हमार जन्म सिध्द अधिकार हवय। येकर खातिर कोनो किसम के रोड़ा अटकाना छत्तीसगढ़ी अउ मानवता विरोधी हो ही ।

- समाज सेवी, पत्रकार रायपुर (छ.ग.)

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