छत्तीसगढ़ का हर जागरूक व्यक्ति अब महसूस कर रहा है कि राज्य बनने के बाद हर तरह की अफरा-तफरी के साथ ही यहां कीमती जमीन की लूट मची है। संस्थानों के नाम पर, कारखानों के नाम पर, होटलों मोटलों एवं सरकारी महकमों के नाम पर भूमि पुत्रों से ऐन केन प्रकारेण जमीन लूटी जा रही है। आज हालत यह है कि रायपुर राजधानी के किसी भी दिशा में किसी सड़क पर निकल जाइए जितने भी होटल, ढाबे, संस्थान फैक्ट्री, स्वीमिंग पुल, फार्म हाउस मिलेंगे प्राय: सब के सब बाहरी लोगों के हैं, यहां बाहरीसे मेरा मतलब ऐसे लोगों से है जिनको छत्तीसगढ़ के हितों से कोई मतलब नहीं , यहां के जनजीवन की सुविधाएं उनके ऐशो आराम से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं और जहां काम करके आजीविका चलाने वाले निचले तबके के कामगार भी बाहर से मंगाए गए हैं यानि अपनी जमीन से बेदखल व्यक्ति का जहां प्रवेश तक वर्जित है ऐसे बाहरी लोगों ने न केवल जमीन में कब्जा कर रक्खा है अपितु आसपास के गांवों के रास्ते, तालाब, पानी के अन्य स्त्रोत श्मशान और चारागाह तक नहीं छोड़ा है। इनके खुलने से आजीविका चलाने का सपना देखने वाला भूमि पुत्र बुरी तरह ठगा महसूस कर रहा है एवं छोटी छोटी सहूलियतों के लिए उपरोक्त बाहरी लोगों की कृपा का मोहताज हो गया है। इसमें सबसे अफसोस जनक पहलू यह है कि सरकार को वह उन्हीं के संरक्षक के रुप में पा रहा है। सरकारी महकमे, न्याय व्यवस्था, थाने और मानव अधिकार का ढ़िढोरा पीटने वाले लोग जानबूझकर चुप हैं या असहाय है। राजधानी और चौड़ी सड़क के नाम पर जहां सरकार खुद ऐसे कार्यों में लिप्त है वहां उससे क्या, आशा की जा सकती है। सरकारी जमीन भी तो बाहुबल जन बल या धन बल वाले हथिया रहे है। जमीन की लूट रोकने के लिए एैसा कोई सिस्टम ही नहीं है जो नजर रखे और ऐन समय पर कार्यवाही करे। सबसे दु:खद बात यह है यहां के भूमि पुत्रों के पढ़े लिखे बेटे जो वकील बने, थानेदार बने पटवारी बने या मंत्री बने बजाय आगे बढ़कर रोकने के सहायक का रोल निभा रहे हैं।
क्या ही अच्छा होता कि कम के कम माटी से जुड़े वकीलों का कोई संगठन बनता जो भूमि पुत्रों को बेबसों को ऐसी लूट से बचाता या न्याय दिलाता मगर ऐसे लोग अपनी गाड़ी में पेट्रोल डलवाने की एवज में गांवों के रास्तों की कुरबानी दे रहे हैं। उनके भीतर की संवेदना जाने कहां मर गई है जो लूट की दौलत में अपना हिस्सा तलाशने की क्रूरता में लिप्त हैं। निर्दोष के बदले दोषी का साथ दे रहे है जिन गांवों के जमीन देने से मना किया उनकी हालत चौरेंगा जैसी हो चुकी है यानि अदालतों के चक्कर लगाते जिन्दगी कट रही है अब तो भू-माफिया के ेबीच खूनी खेल भी शुरु हो चुका है, लोग चिंता में, गांव तनाव में और जागरूक नागरिक अंतहीन प्रक्रियाओं में डूबे हुए हैं लेकिन सरकार की संवेदना जाने क्यों काफूर हुई जा रही है।
मेरे परिचित साहू जी की करोड़ों की पुश्तैनी जमीन उद्योगपतियों ने जबरन हथिया ली और औने पौने दाम देकर बाहुबलियों के जोर से हस्ताक्षर करवा लिया अब वे हताश निराश होकर न्याय मिलने की आशा छोड़ बैठे है सरकार तक को जो चूना लगा रहे है उनसे एक सीधा सादा आदमी कैसे निपट सकता है? सोनबेर जी का छ: हजार वर्ग फीट का प्लाट था जिस पर पड़ौसी राज्य के लोगों ने बेजा कब्जा कर लिया और झोपड़ियां तान ली अब अपने रहने के लिए उन्होंने जब मकान बनाना चाहा तो स्वयं की जमीन का उन्हें मंहगा दाम देना पड़ा वह भी मान एक हजार वर्ग फीट का टुकड़ा की नाना प्रकार के तिकड़मो के बाद हाथ लगा बाकी जमीन पर अभी भी जबरदस्ती के मेहमान काबिज हैं पटेल जी की आठ दस एकड़ जमीन है जिसपर साग-सब्जी उगाकर उन्होंने अपने तीन बेटो का मतिष्क बनाया अब बच्चे अन्यत्र नौकरी पर है और पटेल बूढ़े असमर्थ इस लाकर नहीं कि जीविकोपार्जन कर सकें, ऊपर से उनकी जमीन के बीचों बीच एक भूमाफिया ने एक टुकड़ा खरीद लिया है अब वो इन्हें रास्ता देने के लिए जमीन मांग रहा है और उसने रास्ता बना भी लिया है वह उनकी सारी जमीन हथियाने के फेर में है पटेल जी पिछले कई सालो से टेंशन में है कि जिस धरती माता ने उन्हें जीवन भर पाला पोसा उसका सौदा कैसे करें मगर सामने वाला तो इस तैयारी में है कि जमीन मालिक जीए या मरे जमीन तो वो हथिया कर ही रहेंगे, वहां प्लाट बनाकर ऊंचे दामों में बेचेंगे चिंतक श्री नंद किशोर शुक्ला की चिंता यह है कि जमीन बाहरी लोग ऊंचे दामों में खरीद लेते है इससे भाव इतना बढ जाता है कि भूमि पुत्रों के उसे पुन: खरीदने की हैसियत ही नहीं रह जाती दो चार साल निकी जमीन के पैसे से बढ़िया खाते पीते हैं, पीते खाते हैं मेहमान नवाजी करते हैं और उसके बाद भूमिहीन मजदूरों का जीवन ठीक जीने के लिए अभिशप्त हो जाते हैं, पद्यश्री डा.महादेव प्रसाद पाण्डेय भविष्य का भयावह चेहरा देखते है उनकी चिंता यह है कि छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़िया अल्पसंख्यक न हो जाए, जिस रफ्तार से बाहरी लोगों का आगमन हो रहा है वह यहां की शांति के लिए खतरनाक सिध्द हो रहा है बेमेतरा के पास के एक गांव में इसका भयानक उदाहरण सामने आ चुका है अधिकांश राजनेताओं के जमीन के धंधे में लिप्त होने के कारण सारा परिवेश लूट खसोट का 'ओलम्पिक' स्थल सिध्द हो रहा है।
कहने को तो संवैधानिक व्यवस्था है कि आदिवासी की जमीन आदिवासी के अलावा कोई खरीद नही सकता लेकिन समर्थ लोग बेनामी खरीदी कर जमीन हथिया रहे हैं दूर दराज के इलाकों में सेवा की आड़ में चर्च के प्रबंधकों द्वारा दान में मांगने , मिट्टी के मोल खरीदने एवं जबरन जमीन लूटने की शिकायत लगातार आ रही है ऐसे इलाकों में भी शांति खतरे में है। आदिवासी क्षेत्रों में बड़े बड़े कारखानों के लिए हजारों एकड़ जमीन बांटी जा रही है बगैर इस बात पर ध्यान दिए कि जमीन खोने वाले को उचित मुआवजा, जीने का साधन, रहने के लिए आवास मिल रहा है या नहीं, सरकार यदि कठोरतापूर्वक अपने बनाये नियमों का पालन करे तो नक्सलवाद के विस्तार में रोक ही लगेगा- होना तो यह चाहिए कि इसके अलावा भी कारखानों को होने वाले लाभ का उचित अंश भी जमीन मालिकों को मिले, वे कारखाने के शेयर होल्डर बनाये जायं यदि ऐसे उपायों पर व्यापक ध्यान नहीं दिया गया तो, आज के कर्णधारों का भी उसी समस्या से जूझना पड़ेगा जिससे आज भूमि पुत्र जूझ रहे हैं। छत्तीसगढ़ में बाहरी लोगों का आकर बसने, चल संपत्ति खरीदने एवं नागरिकता हथियाने पर प्रतिबंध लगाया जाना एक जरूरी कदम हो सकता है, किसी भी राज्य में अन्य राज्य के लोगों के आने, बसने एवं अव्यवस्था फैलाने की कोई सीमा है या नहीं है इस मुद्दे को छोड़ देना भविष्य में भयानक विपत्ति को आमंत्रित करने जैसा है.
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