राज्य की अस्मिता और स्वाभिमान से जुड़े मुद्दे छत्तीसगढ़ी बोली को भाषा दर्जा दिलाने शुक्रवार को विधानसभा में अशासकीय संकल्प को चर्चा के बाद सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। इसके अलावा प्रदेश के भिलाई में आईआईटी और राजधानी के पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय को केन्द्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने संबंधी अशासकीय संकल्पों को भी सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया । आसंदी की आपत्ति के बाद भी इस मुद्दे पर सदन में चर्चा के दौरान सत्तापक्ष और विपक्ष के विधायकों ने अपने भाषण का कुछ अंश छत्तीसगढी में ही दिया ।
चर्चा के शुरूआत करते हुए कांग्रेस विधायक दल के उप नेता भूपेश बघेल ने अपने संकल्प में प्रदेश में बोली जाने वाली छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान के अनुच्छेद 347 के तहत राज्य की सरकारी भाषा के रूप में मान्यता देने की मांग की। उन्होंने कहा कि हमें सतमसता और सहयोग के रूप में छत्तीसगढ़ राज्य तो मिला लेकिन छत्तीसगढ़ी भाषा नहीं मिली। विपक्ष के उपनेता भूपेश बघेल ने अपने लच्छेदार भाषण में कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा हमारी भावनात्मक लड़ाई है इसे सम्मान देना अपनी मां को सम्मान देने जैसा हैं । उन्होंने कहा कि पिछली विधानसभा में तत्कालीन विधायक डोमेन्द्र भेड़िया ने इस मुद्दे पर अशासकीय संकल्प लाया था जिसे सर्वानुमति से पारित किया गया था। उपनेता भूपेश बघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ी बोली गरीब, मजदूर, किसान और व्यापारियों समेत दूसरे प्रदेशों से आने वालों की सम्पर्क भाषा है।
उन्होंने कहा कि जिन राज्यों में केवल सात-आठ लोग उस बोली को बोलते हैं उसे सरकारी भाषा का दर्जा मिल जाता है तब छत्तीसगढ़ी को यह दर्जा क्यों नहीं मिल सकता। चर्चा में भाग लेते हुए भाजपा के सदस्य कोमल जंघेल ने कहा कि छत्तीसगढ़ बोली को भाषा के रूप में सरकारी मान्यता के लिए अनेक माध्यमों से लगातार मांग की जाती रही है। छत्तीसगढ़ी बोली को शासकीय भाषा का दर्जा मिलने से राज्य का सम्मान बढ़ेगा। कांग्रेस के सदस्य रवीन्द्र चौबे ने संकल्प पर चर्चा के लिए आसंदी से छत्तीसगढ़ी में बोलने की अनुमति मांगी।
उन्होंने कहा कि अगर आसंदी की अनुमति नहीं मिलेगी तो वे चर्चा में भाग नहीं लेंगे। इस पर सभापति अघन सिंह ठाकुर ने कहा कि सभा की पूरी प्रक्रिया राजभाषा में चल रही है, छत्तीसगढ़ी में बोलने से नई परम्परा की शुरूआत हो जाएगी और सदस्यों का भाषण रिकार्ड होने में परेशानी आएगी। इस पर कांग्रेस सदस्य रविन्द्र चौबे ने कहा कि जब सदस्य कभी अंग्रेजी या संस्कृत में बोलते हैं तब उनका भाषण रिकार्ड हो जाता है वह नहीं चाहते कि उनका भाषण रिकार्ड हो लेकिन वे छत्तीसगढ़ी में ही बोलना चाहते हैं।
बाद में उन्होंने अपना भाषण हिन्दी में ही दिया। वरिष्ठ सदस्य रविन्द्र चौबे ने कहा कि उन्हें इस बात का बेहद अफसोस है कि छत्तीसगढ़ी के संकल्प पर हिन्दी रहे रहे है।
उन्होंने कहा कि जब पंजाब की भाषा पंजाबी और गुजरात की भाषा गुजराती हो सकती है तो छत्तीसगढ़ की भाषा छत्तीसगढ़ी क्यों नहीं हो सकती। विपक्ष के नेता महेन्द्र कर्मा ने कहा कि संसद में सदस्य अपनी भाषा में बोलते है तो उसका अनुवाद होता है। इसी तरह हमारे सदस्यों को इस संकल्प पर चर्चा में छत्तीसगढ़ी में बोलने की अनुमति दी जानी चाहिए। इस पर संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने कहा कि संसद में इसके लिए नियम बना है उन्होंने विपक्ष पर इस मुद्दे को लेकर राजनीति करने का आरोप लगाते हुए कहा कि जब कांग्रेस की सरकार थी तब छत्तीसगढ़ी को भाषा का दर्जा क्यों नहीं दिलाया गया। सदन में संस्कृति मंत्री ने भी अपनी बात छत्तीसगढी में ही कही।
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