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विश्वविख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन के अनुसार ''अकाल हमेशा एक विभाजक प्रक्रिया होती है। पीड़िफ लोग अमूमन समाज के सबसे निचले फबके के होते हैं - गरीब किसान, अधिकाश: भूमिहीन कृषि मजूदर, सीमांत या छोटे किसान आदि । कदाचित आज तक ऐसा अकाल कभी न हुआ जिसने हर एक व्यक्ति को समान रूप से प्रभावित किया हो ।''अकाल और पलायन के वास्तविक भुक्तभोगियों की पहचान करने से पूर्व छत्तीसगढ़िया की जलवायु, अकाल का इतिहास तथा छत्तीसगढ़ीया मजदूरों के पलायन की इतिहासपरक लेकिन स्पष्ट जानकारी रखकर ही इस समस्या के मूल तक पहुंचा जा सकता है।
पलायन के लिए मजबूर छत्तीसगढ़िया मजदूर
- चंद्रशेखर साहू
''क्या मौसम के इस तेवर से तुम्हारा दिल दहल नहीं जाता ? इस बार जरुर फसल बहुत खराब होगी.... और कीमतें आसमान छू रही होंगी- इनके साथ ही एक अपूर्व कमी होगी रोजगार की, जिसकी कल्पना से ही लगता है कि शरीर का मांस कंकाल से अलग होकर गिरने लगेगा- एक तिहाई आबादी मर-खप जाएगी-बेहतर होता कि इन लोगों को गलियों, सड़कों पर निकाल कर इनकी गर्दने ही काट देते, ठीक उसी तरह जैसा कि हम पालतू सूअरों के साथ करते हैं ।''(रिकार्डो के नाम मिल के पत्र का अंश, अमर्त्य सेन की पुस्तक से उद्वत) नवोदित राज्य छत्तीसगढ़ का वर्तमान परिदृश्य विचित्र विरोधाभासी है,जहां शहरी जनता इस नए राज्य के उदय का जश्न मनाते हुए इसका अधिकाधिक लाभ उठा लेने की फि राक में है, वहीं ग्रामीण जनता अपने उदर-पोषण के लिए, आस-पास में कहीं भी किसी रोजी-रोजगार की संभावना के अभाव में, पलायन करने को विवश है । यह पलायन इलाहाबाद क्षेत्र या मिर्जापुर, मेरठ या दिल्ली, पंजाब , कश्मीर, सूरत या कहीं भी दूर प्रदेशों तक हो सकता है । इस बार के सूखा-अकाल ने शहरी बनाम ग्रामीण के भेद को अत्यंत स्पष्ट कर दिया है क्योंकि सूखे का दुष्प्रभाव अभी गांवों तक ही सीमित है, शहर इससे पूरी तरह अप्रभावित है ।
स्थानीय अखबारों में ग्रामीण इलाकों से छत्तीसगढ़ी मजदूरों के पलायन की खबरें अगस्त महीने से ही प्रकाशित होने लगी थीं । ग्रामीण रोजगार आश्वासन योजना(इ.जी.एस.) के बावजूद ग्रामीण लगातार वृध्दिगत क्रमों में पलायन करते गए और आज तक यह सिलसिला बिना किसी व्यवधान के जारी है । नवोदित राज्य छत्तीसगढ़ के गठन तथा इस राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री के मनोनयन तक हर किसी राजनेता या नौकरशाह ने इस समस्या को नजरअंदाज ही किया, यद्यपि उनका ऐसा करना लोकतांत्रिक भावना के अनुकूल नहीं था । रायपुर के सांसद और केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री श्री रमेश बैस ने सूखा के कारण छत्तीसगढ़ से चार लाख लोगों के पलायन करने संबंधी बयान देकर शासन और प्रशासन को इस दिशा में कुछ करने को मजबूर किया । छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत गैर-सरकारी, स्वयंसेवी संगठनों ने अपने-अपने इलाकों से75 _ह्न त ीसदी तक मजदूरों के पलायन की बातें की । अब तो सरकारी आंक ड़े भी पलायन करने वालों के आंकड़े एकाधिक लाख बताते हुए इस आंकड़ों को अपूर्ण होना स्वीकार कर रहे हैं और वास्तविक पलायनकर्ताओं की तादाद इससे दो गुनी से भी अधिक हो सकती है, ऐसा मानने लगे हैं । अब भी जो लोग गांवों में रह रहे हैं वे या तो उन भाग्यशाली लोगों में से हैं जिनके पास रहने, खाने के लिए अगले साल भर का इंतिजाम है या फि र ऐसे लोग हैं जो शारीरिक अस्वस्थता के कारण बाहर नहीं जा सकते, उन्हें हरहाल में यहीं जीना है या मरना है ।
छत्तीसगढ़िया मजदूरों का मजदूरी की तलाश में महाराष्ट, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, पंजाब जाना कोई नई बात नहीं है । पिछले दो सालों में तीन बार उग्रवादियों की गोलियों का शिकार होकर 30 मजदूरों की मृत्यु की सरकारी पुष्टि के बाद छत्तीसगढ़ से इनका कश्मीरी इलाकों में भी जाने की अधिकृत जानकारी हो गई है । हर साल होने वाले पलायन को लेकर इस बार कुछ ज्यादा ही हो हल्ला होने के पीछे मुख्य कारण यह है कि हर साल सिंचित क्षेत्र के जो दमदार किसान-तेली और कुर्मी-अकाल से अप्रभावित रहा करते थे. उनपर भी इस साल की अनावृष्टि ने अपना असर दिखाया है क्योंकि नहरों से सिंचाई के लिए पानी मिला ही नहीं । किन्तु, इससे यह कदापि नहीं मानना चाहिए कि इस साल के सूखा जनित अकाल ने पूरे छत्तीसगढ़ में सबको समान रूप से प्रभावित किया है । विश्व विख्यात अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन के अनुसार ''अकाल हमेशा एक विभाजक प्रक्रिया होती है । पीड़ित लोग अमूमन समाज के सबसे निचले तबके के होते हैं - गरीब किसान, अधिकाश: भूमिहीन कृषि मजूदर, सीमांत या छोटे किसान आदि । कदाचित आज तक ऐसा अकाल कभी न हुआ जिसने हर एक व्यक्ति को समान रूप से प्रभावित किया हो ।'' अकाल और पलायन के वास्तविक भुक्तभोगियों की पहचान करने से पूर्व छत्तीसगढ़िया की जलवायु, अकाल का इतिहास तथा छत्तीसगढ़ीया मजदूरों के पलायन की इतिहासपरक लेकिन स्पष्ट जानकारी रखकर ही इस समस्या के मूल तक पहुंचा जा सकता है ।
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