नकटा के नाक कटे
चार आंगुर बाढ़े
- लक्ष्मण मस्तूरिया
मोटहा खाल के मनखे के देंह ल लाज सरम घलो नइ भेदय। अपने मुंह पेट के सुवारथ म माते रही वोला भला देस समाज के भलाई ले का मतलब काली रात म बस्ती भर के मनखे जुरियाये रहीन। गांव गंवई के मनखे मन के संसो देख के मोला अपन सोचे गुने के ऊंचाई म भरम होगे। घेरी बेरी चुनाव के हल्ला गुल्ला म गांव गली मतला गे हे। जब जब चुनाव के घोसना होथे अलाल कोढ़िया ठेलहा लपरहा मन के मुंह हरियाय सही लागथे। खाये पीये बर खुल्ला गोल्लर कस भागत फिरत रथें। कोनो एक पार्टी के झंडा के भरोसा नइ बांधे फिरे जउन आगे गांव म वोकरे जय बोले लागथे। भिथियाभांड़ी के दुरदसा कर डारथे। रंग गेरु पहली चुनाव के धोवाय पोंछाय नइहे अब एदे नवा रंग पोते के पारी आगे। जे मन के पांच पइसा परभाव नहीं रहे वोमन सैकड़ों कारकरता के जोम मारत फिरथे। चला भला इही रोजगार म गांव बस्ती के दू-चार लपरहा मनके रोजी रोटी खाना पीना निकल जाथे। बिड़ी मांग के पियइया मन के जेब म सिगरेट के पाकिट देखके चुनाव के महात्तम समझ म आथे। फेर मार पीट गलौच के नौबत आथे तभे गांव गंवई के हालत बिगड़थे। गंवइहा मनखे के कतेक बुध्दि कहत रहें के आंसो चुनाव के एको ठन गाड़ी मोटर ल गांव म नइ घुसन देना हे भांठा म पाल तान के सभा करैं। सूते बर नइ मिले रात बिकाल वोट दो वोट दो कहत गांव म घुसर आथे। दूसर कहत रहे अरे अइसे म नइ बने जउन हमर गांव म आही हमर गांव बर पांच दस हजार चंदा देही तभे बनही। बहुत लबारी सुनत होगे। चुनके जाथे तहां कठुवा जाथें। अरे अतका दानी होतिन तब चुनाव काबर लड़तिन। लूटे बर चुनाव लड़े जाथे। लुटाय बर नहीं समझे बाबू। डोकरा के तरफ बुध्दि के भारी असर परिस। एक झन अधेड़हा कस मनखे कुरथा के बाहीं चढ़ावत कहिस तब कइसे करे जाय बबा तही बता मोर समझ म तो अब कोनो पार्टी के मनखे वोट पाय के अधिकारी नइहे। जउन चार छै महिना घलो सरकार नइ चला पावै। अउ दूसर मन गोड़ खिंचाई म लगे रथे। तब अइसन नलायक मन ला वोट देना महा पाप हे। कोनो नवा मनखे तलासना परही। अब पार्टी बल्कि बने मनखे के मान रखना परही। अरे बने मनखे माने जेकर आचरन बेवहार ठीक रहे गुंडा गरदी म मिझरे झन रहे। अब देखले एक झन नेता तो चार चार महिना म दल बदलत हे। पूछे म कथे जेती कुरसी मिलही उही दल म रहना हे। बिन कुरसी के राजनीति करना बेइमानी आय। अइसे कुरसी खोज नेता मन के का भरोसा भइया। चुने नइ चुने बरोबर आय। एकर सेती भला मनखे के भरोसा करो। वोट देना तो परही चाहे कोनो ल दे। जतका लुटत बने लूटो अउ एन बखत अपन सही आदमी ल वोट दो। एक झन नवा उमर के लइका सही नवा मतदाता के उत्साह उमड़ के कहिस वाह बबा नेता पद म खड़े होही वोला का अतेक मुरुख समझत हस के पहली ले रुपिया बांटही। रुपिया देही तहां छाती म चढ़ के वोट डरवाही। चार गुंडा आगू पाछू घुमाही अइसे जादू मंतर के बात करही के डारे वोट घलो भेद उगल देही। मन म चोर समाही तहां दूसर बने मनखे के छाप वोट के ठप्पा नइ मार सकबे। अइसने लोभ लालच म फंस फंस के तोसब परजातंत म नलायक नेता के महत्व बढ़ा डारेव। अरे चाहे कोनो पार्टी के नेता होय हमर गांव के स्कूल के छानी छाही उही ल वोट देना हे। पीछू कुछु करे। मतलब। तब तो गांव गांव स्कू ल मदरसा के छानी छाय म खड़े नेता के छानी उजर जाही। हत रे मुरुख भला कोनो अपन पइसा म कभू कोनो चुनाव लड़थे का ? चुनाव तो पार्टी के चंदा के रुपिया म लड़े जाथे कतको झन आधा बचा घलो लेथे। हारे हपटे म काम परही कहिके।
दूसर दिन एक झन डोकरी अपन परछी म चांउर निमारत चुनाव लड़इया मन ल बखानत रहे, हत रे अभागा हो घेरी बेरी चुनाव लड़ लड़ के रुपिया पइसा के सतियानास काबर करत हौ। देस राज नइ चला सकौ तब फेर चुनाव मैदान म मरदानगी काबर दिखाथो। नकटा के नाक कटे दस हाथ बाढ़े। कतको खाओ डगारो चांटा के चांटा। मंहगाई हटवइया मन के कनिहा ढिल परगे। रोगहा मन नाक ऊंचा करके फेर चुनाव लड़े बर तियार हें। अब का नवा राग अलापही कोलिहा मन देखना हे। मंहगाई बढ़ाथे। उही मन सो चंदा मांग मांग के अपन हालत ल भिखारी बरोबर बना डारे हे तेमन का राज चलाही। कुरसी घलो दुख रोवत होही। अइसन लोभी नेता मन के बइठे ले। नेता पद के अइसे हिनमान कर डारिन के भरोसा नइ होय, के कोनो नेता ईमान वाले घलो होही? देख रे आंखी सुन रे कान। का का कहत हें सुराज के अंधरा कनवा नकटा नेता मन। हे ईसवर तहीं उबार करबे, गरीब के तहीं खबर लेवइया हस तपत हे तेमन ल तपाबे मालिक। नेता पद के नाम म बयपार लूट मचात हे वोमन के कलयान दूनो हाथ ले करबे। अइसे आसिरवाद मिलत हे अब के चुनाव लड़इया मन ल। चुनाव का होही उही लबरा लोभिया मन हुंवा हुंवा नरियाही अउ जनता के भाग फेर अधर म उड़ाही। लूट खसोट के धंधा जिहां मनखे के धरम बने हे, उहां परजातंत्र हावे इही बरदान रुपिया पइसा बर देस घलो ल कोनो दिन बेंच दिही अइसे लागथे।
हमर एक झन गंवइहा के विचार हे के बिन चुनाव के पांच दस बछर देस राज चलना चाही। राष्ट_पति जी ल चाही के गांव गांव ले बनेसज्जन झच्चऊ सुभाव के मनखे ल बला बला के वोकर विचार जान के मंत्री बना देवे। इही बहाना म कतको सुधरे के उपाय करही अइसे लागथे दस बीस बरस जनता के भलाई के काम करे हे वोही ल नामजद सांसद घोषित करना चाही।
चुनाव लड़े मनखे जउन साल भर राज नइ चला पाइन वोमन अपन बर तनखा भत्ता कइसे पास कर डारिन गुने के बात हे। दस निरमान के कानून पास करे म भारी मतभेद उठा पटक मचइया मन कइसे भुखाय भेड़िया कस अपन तनखा अउ भत्ता पाये के कानून ल आंखी मूंद के समर्थन दे दिन। हमर गांव देहात के हजारों मनखे एक बात के भारी निंदा करत मिलिन। फेर हमर का सुनाई होत हे, जउन भारत भाग्य रचइया मन अपने पेट बर चिंता करत हे वोमन के आचरन के महानता ल तो हमर भारत देस रे सुराज राज ह झेलत हे।
सब मिलाके चुनाव निस्पक्ष होय के लक्षन नइ दिखत हे जब चुनाव म दिल्ली भोपाल के नेता हमर गांव के नेता चुनथे तब हमर का औखात हे सिरिफ हाथ उपर करके जयकार करे के हमला सुराज मिले हे। हमर दिल्ली भोपाल के नेता मन के पांव नइ छुए जाये तब कइसे हमर नेता बनही। नेता होय के सबले बड़े योग्यता कहूं ले होय रुपिया के थैली थमा अउ टिकिट बिसाले लोक सभा अउ विधान सभा के।
जनता के भलाई करइया न पहली सुख पांय हे न अब सुख पांय। अइसे नेता चुने म का देस के भलाई होही। जतका बन सके देस के माथा म कलंक के टीका लगाव अउ नाम कमाव। हम जानत हन जउन जउन समाज के मनखे संग दगा करे हे। जउन समाज के मनखे संग दगा करे हे। वोही हमर राजनीति के नायक बने हें। पहली अउ आज म अंतर भारी हे पहली नेता बने बर त्याग तपसिया करे बर परे अउ आज दुनियां भर नंगाईलुच्चाई गछज्ज्लण्ङ्म करना परथे। तब परजातंत्र के नाम कइसे ऊंच होवय। देस विदेस म भारी हांसी होत हे भारत माता के। जिहां चुनाव जीत के सिरिफ अपन सुवारथ बर कानून बनाथे अइसे नेता भारत म पैदा होथे। पद कुरसी के लड़ाई म देस समाज अउ जनता के पीठ म छुरी भोंगथे अइसे नेता चुने जाथे हमर देस म। जनता ऊपर मंहगाई लाद के अपन सुख सुविधा बढ़ाथे अइसे नेता चुने जाथे भारत भुइंया म। आगू राम जाने अउ का होही।
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