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ईदगाह
कहानीकार : मुंशी प्रेमचंद
अनुवाद : सुशील भोले
रमजान के पूरा तीस रोजा के पाछू ईद आइस। कतेक मनोरम, कतेक सुन्दर बिहान। पेंड़-पौधा म थोरूक अलगे हरियाली हे, खेत म अलगे रौनक हे, अगास म अजबे लाली बगरे हे। आज सुरुज देखौ, कतका मयारुक, कतका जुड़ावावन हे, मानो दुनिया ल ईद के बधाई देवत हे। गाँव म अतका हलचल हे। ईदगाह जाये के तइयारी होवथे। ककरो कुरता म गुदाम नइये। परोसी घर सूजी-सूत लाने बर दौंड़त हे। ककरो पनही टांठ होगे हे, तेमा तेल बोथे बर तेली घर भागे जाथे। हबाहब बइला मन ला दाना-पानी दे दन। ईदगाह ले लहुटत मंझनिया हो जाही। तीन कोस के पैडगरी, फेर सैकड़ों मनखे संग जोहार-भेंट करना। मंझनिया के पहिली लहुटना। मुसकुल हे। टूरा पिला मन सबले जादा परसन्न है। कोनो एक रोजा रखे हे, उहू म मंझनिया तक, कोनो वोतको न हीं, फेर ईदगाह जाए के खुसी उंकरे हिस्सा के जिनिस ये। रोजा बुढ़वा-सियान मन बर हो ही। इंकर मन बर तो ईद ये। रोज ईद के नांव रटॅय। आज वो आगे। अब हड़बड़ी होगे हे के लोगन ईदगाह काबर नइ जावत हें। इनला घर-गिरहस्ती के चिंता ले का लेना-देना। सेवई खातिर दूध अउ सक्कर घर म हावय ते नहीं, इनला का हे, ये तो सिरिफ सेवई खाहीं। वो का जानय के ददा काबर बियाकुल चौधरी कायम अली घर दौड़े जावत हे। वोला का जानबा हे के चौधरी आज ऑंखी बदल लय, नहीं त ये ईद मुहर्रम लहुट जाही। वोकर अपन खीसा म तो कुबेर के खजाना भरे हे। घेरी-बेरी खीसा ले अपन खजाना निकाल के गिनथे अउ खुस हो के फेर धर लेथे। महमूद गिनथे, एक-दू, दस-बारा। वोकर जगा एक दरजन (बारा) पइसा हे। मोहसिन जगा एक, दू, तीन, आठ, नौ, पंदरा पइसा हे। इही अनगिनत पइसा म आनी-बानी के जिनिस लानहीं- खेलौना, मिठई, तुतरू, पुक अउ न जाने का-का। अउ सबले जादा परसन्न हे हामिद। वो चार-पांच साल के गरीब-चेहरा, दुब्बर-पातर दुलरवा, जेकर ददा बीते बरस हैजा के कौर बनगे अउ महतारी कोन जनी कइसे पिंवरावत-पिंवरावत एक दिन मरगे। कोनो ल गम नइ मिलिस, का बेमारी ये। कहितीस घलो सुनइया कोन रिहिसे। हिरदे म जेन बीतय वोला हिरदयच म सह लेवय अउ जब एक दिन सहे नइ गिस त ये दुनिया ले बिदा लेलिस। अब हमीद अपन बुढ़ी दाई अमीना के कोरा म सूतथे अउ वोतके मगन हे। वोकर ददा (अब्बाजान) रुपिया कमाय बर गेहे। झोला-झोला धरके आही। दाई (अम्मीजान) अल्लाहमियां के घर वोकर बर बढ़िया -बढ़िया जिनिस लाने बर गेहे, एकरे सेती हामिद मगन हे। आसा तो बड़का जिनिस ये अउ फेर लइका मनके आसा ! उंकर कल्पना तो राई ल पहार बना लेथे। हामिद के पांव म पनही नइये, मुंड म एक ठन जुन्ना असन टोपी, जेकर फूंदरा (गोटा) करिया गेहे, लभो ले वो मगन हे। जब वोकर ददा झोला अउ दाई सुघ्घर जिनिस लेके आही, त वो अपन दिल के मनसुभा ल पूरा कर लिही। तब देखही महमूद, मोहसिन, नूरे अउ सम्मी कहां ले वतका पइसा निकालथें। अभागिन अमीना अपन कुरिया म बइठे रोवत हे। आज ईद के दिन अउ वोकर घर दाना नहीं ! आज आबिद होतीस त का अइसने ईद आतीस अउ चल देतीस? वो अंधियार अउ निरासा के दहरा म बूड़े जात रहिसे। कोन बलाए हे ये निपोरी ईद ल? ये घर म वोकर बसेरा नहीं, फेर हामिद ! वोला ककरो जीए-मरे ले का मतलब? वोकर भीतर अंजोर हे, बाहिर भरोसा। बिपत अपन फौज-फटाका संग आवय, हामिद के आनंद भरे चेहरा वोकर बिनास कर दिही।
हामिद भितरी जा के बुढ़ी दाई ल कथे- तैं डर्राबे झन दाई मैं सबले पहिली आहूं। चिटको झन डर्राबे।
अमीना के करेजा कचोट के रहिगे। गाँव के लइका अपन-अपन ददा संग जावत हें। हामिद के ददा, अमीना के छोड़ अउ कोन हे? वोला कइसे अकेल्ला मेला म जावन दय ! भीड़-भाड़ म लइका कहूं बिसरागे त ! नहीं, अमीना वोला अइसन नइ जान देवय। कोंवर काया तीन कोस रेंगही कइसे? पांव म फोरा पर जाही। पनही घलो नइये। वो थोर-थोर रेंगा के कोरा म पा ले करही, फेर इहां सेवई ल कोन रांधही। पइसा होतीस त लहुटत बेरा जमो जिनिस ल जोर के चुनुन-चानन बना देतेंव। इहां तो चीजे मनला सकेले म कई घंटा पहा जाही। मंगनी-जॅचनी के तो भरोसा हे। वो दिन फहीमन के कपड़ा सिले रेहेंव। आठ आना मिले रहिसे। वो अठन्नी ल ईमान-धरम कस बचावत रिहिसे इही ईद खातिर। फेर काल रउतईन मुंड़ म आके बइठगे। त का करतिस ! हामिद खातिर कुछे नइये त दू पइसा के दूध तो लागबेच करही। अब तो कुल जमा दू आना बांचे हे। तीन पइसा हामिद के खीसा म, पांच अमीना के गुप्ती म। इही तो संपत्ति ये अउ ईद के तिहार हे ! अल्लाह बेड़ा पार लगा। धोबनीन, नवइन, मेहतरीन अउ तुरकिन सबो तो आही। सबो ल सेवई चाही, अउ थोक-थाक म ककरो आंखी नइ भरय। काला-काला देख के मुंह लुकाही। अउ मुंह काबर लुकाही? साल भर के तिहार ये। जिनगी सही राहय, वोकर भाग घलो तो वोकरे संग हे। लइका ल खुदा सलामत राखय। इहू दिन बुलक जाही।
गाँव ले मेला रेंगिस। अउ लइका मन संग हामिद घलो जावत रहिसे। कभू सबो झन दौंड़ के आगू बढ़ जाय। फेर कोनो पेंड़ के खाल्हे म सुरता के संगवारी मनके अगोरा करय। एमन काबर अतेक धीरे रेंगथे। हामिद के पाँव म तो जइसे पांखी जामगे रिहिसे। वो कभू थक सकथे? सहर के कोर आगे। सड़क के दूनों मुड़ा गौंटिया मन के बाग-बगीचा हे। सिरमिट वाला पक्का रुंधान बने हे। पेड़ म आमा लीची लदाये हे। कभू-कभू कोनो टूरा ढेला-पखरा उठा के आमा म तुक्का लगाथे। रखवार गारी बकत भीतर ले निकलथे । टूरा मन उहां ले फर्लाग भर दुरिहा हें। खिलखिलाथें। रखवार ल कइसे ठगेन।
बड़का-बड़का महल-अटारी आए लागिस। ये कछेरी ए, ये कॉलेज ए, दे ला क्लब घर कहिथें। अतेक बड़ कॉलेज म कतेक लइका पढ़त होहीं। सबो लइका नइये जी। बड़े-बड़े मेछा हे, अतेक बड़े होगे हें अउ पढ़े ल जाथें। कोन जाने कब तक पढ़हीं अउ का करहीं अतका पढ़के? हामिद के मंदरसा म दू-तीन बड़का हे, बिल्कुल तीन कौड़ी के, रोज गारी खाथें, बुता ले चोट्टई करइया। इहू जगा वइसने किसम के मन होहीं का। कलब घर म जादू होथे। सुने हन इहां मुरदा मन के खोपड़ी दौंड़थे अउ बड़े-बड़े तमासा होथे, फेर कोनो ल भितरी म नइ खुसरन दयं। अउ इहां संझा साहब मन खेलथें, बड़े-बड़े मनखे खेलथें, मेंछा-डाढ़ी वाले अउ मेम साहब मन घलो खेलथें, सच। हमर दाई ल वो दे दौ, का नांव हे, बैट, त वोला धरेच नइ सकही। घुमावत-घुमावत खुदे घूम जाही।
महमूद कहिस - हमर अम्मी के तो हाथ कांपे ल धर लेही, अल्ला कसम।
मोहसिन कथे- चल-चल, किलो-किलो पिसान पिसथें, थोरिक बैट ल धर लेही त हाथ कांपे लगही। सैकड़ों मरकी पानी रोज निकालथे। पांच मरकी तो हमर भइंस पी जाथे। कोनो मेम ल एक मरकी पानी भरे बर परगे त आंखी म अंधरौटी छा जाही।
महमूद-फेर पल्ला तो नइ दौड़य, टिंगटिंगहिन कस तो नइ कूद सकय।
मोहसिन - हां, कूदे फांदे नइ सकय, फेर वो दिन हमर गाय ढिलागे रहिसे अउ चौधरी के खेत म जा धंसे रहिसे, त अम्मा अइसे पल्ला दौड़े रिहिसे के मैं वोला नइ पहुंचा पाए रेहे हौं, सिरतोन।
आगू बढ़िन। मिठईवाला मनके दुकान आए लागिस। आज अब्बड़ सजे हे। अतेक मिठई कोन खाथे? देख न एकक दुकान म मनो-मन। सुने हन रात म परेतीन आके बीसा ले जाथें। अब्बा कहिथें आधा रात के एक आदमी दुकान म आथे अउ जतका बांचे रहिथे सबो ल नपवा लेथे अउ सिरतोन के रुपिया देथे, बिल्कुल अइसने रुपिया।
हामिद ल भरोसा नइ होइस- अइसनहा रुपिया परेतीन ल कहां ले मिल जाही?
मोहसिन कहिस- परेतीन ल रुपिया के का कमी? जेन खजाना म चाहय. चले जाय। लोहा के दरवाजा इनला नइ रोक सकय जनाब, तैं हावस का फेर म। हीरा-जवाहरात सब उंकर जगा रहिथे। जेकर ऊपर खुस होगे, वोला टुकना भर जवाहरात दे दिस। अभी इहां बइठे हें, पांच मिनट म कलकत्ता पहुँच जाहीं।
हामिद फेर पूछिस- परेतिन मन बड़का-बड़ा होवत होहीं।
मोहसिन- एकक ठन ह बादर बरोबरा होथे जी। भुइयां म खड़ा हो जायं त मुंड़ अगास टकरा जाय, फेर चाहय त एक ठन लोटा म खुसर जाय।
हामिद- लोगन उंनला कइसे खुस करत होहीं? कोनो मोला ए मंतर ल बता दिही त एक झन परेतीन ल खुस कर लौं।
मोहसिन- इहीच ल तो नइ जानौं, फेर चौधरी साहब के कब्जा अबड़ अकन परेतीन हें। कोनो जिनीस के चोरी हो जाय, चौधरी साहब वोकर पता लगा लेहीं अउ चोर के नांव घलो बता दिहीं। जुमराती के बछवा वो दिन गंवागे रिहिस। तीन दिन हाय-हाय करिन फेर कहूं नइ मिलिस। तब हार-थक के चौधरी मेर गिन। चौधरी तुरते बता दिस के कांजी हाऊस म हे, उहें मिलही। परेतीन आके वोला सरी दुनिया के खबर दे देथे।
अब वोला समझ आइस के चौधरी मेर कइसे अतेक धन हे, अउ काबर वोकर अतका सनमान हे।
आगू चलिन ! ये पुलिस लाईन ये। इहां सब सिपाही मन परेड करथें। रैटन ! फाम फो ! रात के बिचारा मन घूम-घूम के पहरा देथें, नइते चोरी हो जाही। मोहसिन प्रतिवाद करत कहिस- ये सिपाही मन पहरा देथे? तभे तैं जादा जानथस। अजी हजरत, इही मन चोरी करवाथें। सहर म जतका चोर-डकैत हें, सब इंकर संग मिले हें, रात म तो ए मन चोर ल चोरी करे बर कहिथें। अउ खुद दूसर मुहल्ला म जाके जागते रहो ! जागते रहो ! चिचियावत रहिथे। तभे एकर मन करा अतेक रुपिया आथे। मोर ममा एक ठन थाना म सिपाही हे। बीस रुपिया महीना पगार पाथे, फेर पचास रुपिया घर भेजथे। अल्ला कसम। मैं एक बेर पूछे रहेंव ममा आप अतेक रुपिया कहां ले पाथौ? हांस के कहे रहिसे- बेटा, अल्ला देथे। फेर खुदे कहिस- हमन चाहन त एके दिन म लाखों मार लेवन। हम तो अतके लेथन, जेमा अपन बदनामी झन होवय अउ न नौकरी जाय।
हामिद पूछिस- ये मन चोरी करवाथें त कोनो इनला पकड़ंय नहीं?
मोहसिन वोकर नदानी ऊपर तरस खावत कहिस- अरे जकला, इनला कोन पकड़ही? पकड़इया तो एमन खुदे आंय। फेर अल्ला एमन ल सजा घलो ठउका देथे, हराम के माल हराम म जाथै। थोरके दिन म मया के घर जमा-पूँजी राख होगे। एक ठन भांड़ा तक नइ बांचिस। कतको दिन पेंड़ तरी सूतीन, अल्ला कसम, पेंड़ तरी। फेर न जाने कहां ले सौ रुपिया उधार लानिस त बरतन-भांड़ा आइस।
हामिद- एक सौ तो पचास ले जादा होवत होही।
कहां पचास अउ कहां एक सौ पचास ह एक ठन झोला म हमा जाथे, फेर सौ ह दू झोला म घलो नइ आवय।
अब बस्ती घन दिखे लगिस। ईदगाह जवइया मन के टोली दिखे लागिस। एक ले बढ़के एक चमकदार कपड़ा पहिने। कोनो रिक्शा-टांगा म सवार त कोनो मोटर ऊपर, सबो इतर के महक म बूड़े, सबो के हिरदे म उमंग। गांव वाला मन के वो नानचुक टोली, अपन गरीबी ले बेसुध, संतोस अउ धीरज म मगन चले आवथे। लइका मन बर सहर के जम्मो जिनीस अजूबा बरोबर हे। जेन चीज ल देखतीन देखते रहि जातीन। अउ पाछू डहार ले घेरी-बेरी पों-पों के आवाज म घलो नइ चेतंय। हामिद तो मोटर के तरी म खुसरते खुसरत बांचीस।
तभे ईदगाह दिखिस। ऊपर म अमली झुंझकुर पेंड़ के छॉव हे। तरी पक्का फर्रस हे, जेमा जाजिम बइठे हे। अउ रोजादार मन लाईन एक के पाछू एक जाने कहां तक चल दिए हे, पक्का जगत के खाल्हे तक, जिहां जाजिम घलो नइये। नवा अवइया मन पाछू के लाईन म खड़ा हो जाथें। आगू जगा नइये। इहां कोनो पद-पइसा नइ देखय। इस्लाम के नजर म सबो बरोबर हें। ये गांव वाला मन घलो वजू करिन अउ पाछू के लाईन म खड़ा होगे। कतका सुघ्घर संचालन होथे, कतका सुघ्घर व्यवस्था। लाखों मुंडी एक संग सिजदा म नव जाथे, फेर सबके सब एके संग खड़ा हो जाथे। एक संग निहारथें अउ एके संग माड़ी के भार बइठ जाथें। इही क्रिया कतको बेर होथे, जइसे नान-नान बिजली के झालर एक संग जलाथें अउ बुझा जाथें, घेरी-बेरी कतेक मनोरम दृस्य रहिसे जिनकर सामूहिक क्रिया, बढ़वार अउ अनंत हिरदे के सरधा, गरब अउ आत्मा के आनंद ले भर देवय। जइसे भाईचारा के एक धागा ये सबो आत्मा मनला एक ठन माला म गुंथ दिए हे।
नमाज सिराइस, लोगन आपस म गल-बइहां करे लागिन। तब मिठई अउ खेलौना मनके दुकान सैमो-सैमो करे लागथे। गांव वाला मन के टोली एक बुता म लइका मन ले कस उत्साही नइये। ये देखौ, ढेलवा ये, एक पइसा देके चढ़ जावौ कभू सरग जाये असन लागही त कभू भुइयां म पटके असन। ये आंवर-भांवर वाला रहचुली ये, लकड़ी के हाथी, घोड़ा, ऊंट लोहा के छंड़ म लटके हें। एक पइसा देके बइठ जा अउ पचीस भांवर के मजा ले ले। महमूद अउ मोहसिन, नूरे अउ सस्मी ये घोड़ा अउ ऊंट म बइठथें, हामिद दुरिहा म खड़े रहिथे। तीन पइसा तो वोकर करा हे। अपन खजाना के एक तिहाई वो थोरिक भंवरी घूमे बर नइ दे सकय।
सब ढेलवा-रहंचुली ले उतरथें। अब खेलौना लेहीं। एती ओसारी-पारी दुकान सजे हे। आनी-बानी के खेलौना-सिपाही अउ गुजरिया, राजा अउ उकील, भिखारी अउ धोबनीन अउ साधु। वाह! कतेक कतेक सुघ्घर वर्दी अउ लाली पगड़ी वाला, खांध म बंदूक टांगे। अइसे लागथे अभी परेड करके आवत हे। मोहसिन ल भिस्ती पसंद आइस। कनिहा निहरे हे, ऊपर मस्क धरे हे। मशक के मुंह ल एक हाथ म धरे हे। कतेक खुस हे। जइसे कोनो गीत गावत हे। बस, मशक ले पानी उलचना चाह थे। भूरे ल उकील संग मया हे। कइसे विद्वता हे वोकर मुंह म। करिया चोंगा, तरी म सफेद कुरता, कुरता के आगू के खीसा म घड़ी, सोनहा जंजीर, एक हाथ म कानून के पोथा धरे हे। लागथे अभी कोनो कछेरी म बहस नइ त जिरह करे बर जावत हे। ये सबो दू-दू पइसा वाला खेलौना ये। हामिद करा कुल जमा तीन पइसा हे, अतेक महंगा खेलौना वो लेवय कइसे? खेलौना कहूं हाथ ले छूटगे त टूटके बुकनी हो जाही। थोरको पानी परिस ते जम्मो रंग ह पटपटा जाही। अइसन खेलौना ल लेके का करही, का काम के?
मोहसिन कहिथे- मोर भिस्ती रोज पानी दिही, संझा-बिहनिया।
महमूद- अउ मोर सिपाही घर के रखवारी करही। कोनो-चोर आही, त तुरते बंदूक म टीप दिही।
नूरा- अउ मोर उकिल भारी मुकदमा लड़ही।
सम्मी- अउ मोर धोबनीन रोज कपड़ा धोही।
हामिद खेलौना मनके चारी करथे- माटीच के तो आय, गिरिस ते बुकनी हो जाहीं। फेर ललचावत आंखी म खेलौना मनला देखथे घलो। अउ चाहथे के थोरके बेरा वोला हाथ म धर लेवय। वोकर हाथ लामथे घलोक, फेर टूरा अतेक त्यागी-महात्मा नइ होवय, अउ खास करके तब जब सउंख ह नेवरिया होवय। हामिद ललचावत रहि जाथे।
खेलौना मन के पाछू मिठई आथे। कोनो रेवड़ी लेइस, कोनो गुलाब जामुन, कोनो सोहन हलबा। चटकार-चटकार के खावथें। हामिद जात निकाला म हे। बपरा करा तीने पइसा हे। काबर कुछु ले के नइ खाय? ललचाए नजर ले सबो कोती देखथे।
मोहसिन कहिथे- हामिद, रेवड़ी लेग जा कतेक ममहाववत हे।
हामिद ल लागिस, ये तो तुतारी हुदरे कस दिल्लगी ये, मोहसिन अतेक चाकर छाती के नइये, फेर अइसन जान के घलो वोकर मेर जाथे। मोहसिन दोना ले निकाल के एक ठन रेवड़ी वोकर कती लमाथे। हामिद हाथ पसारथे। मोहसिन रेवड़ी ल अपने मुंह म हुरस लेथे। महमूद, नूरे अउ सम्मी ताली पीट-पीट के हांसथें। हामिद खिसिया जाथे।
मोहसिन- अच्छा, अब सिरतो देबो हामिद, अल्ला कसम, ले ले।
हामिद- धरे राह ! मोर जगा पइसा नइये का?
सम्मी- तीने पइसा ताय। वतका म का-का लेबे?
अहमद- एले मोर तीर ले गुलाब जामुन ले ले हामिद। मोहसिन खइटकार हे।
हामिद- मिठई का भारी जिनीस ये। किताब में एकर चारी लिखाए हे।
मोहसिन- फेर मन कुलबुलावत होही मिलतिस ते खा लेतेंव कहिके। अपन पइसा ल काबर नइ हेरत हस?
महमूद- हम एकर चतुरई ल जानत हन हमर मनके जम्मो पइसा उरक जाही, तहां ले हमन ल टुहूं देखा-देखा के खाही।
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