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छत्‍तीसगढ़ी और छत्‍तीसगढ़ की इंटरनेट पत्रिका . . .

संपादकः आसिफ इकबाल
मानसेवी सलाहकारः डॉ. सुधीर शर्मा
छत्‍तीसगढ़ - छत्‍तीसगढ़ी अउ अब छत्‍तीसगढ़ी राजभाषा
 

Jai Chhattisgarh Montly Magazine

घर ले के तैं का करबे

उपन्यास अंस के भावानुवाद

आद्योगिकीकरन, बाहरी आदमती अउ विकास के आकंड़ाई उद्धोस, राजनैतिक छल के सिकार हो के छत्तीसगढ़ आज रोवत हे, अउ रोवाई के सुनइया कोनो नइये । अइसनहे दसा के कच्चा चिट्ठा जगदीशचन्द्र के उपन्यास 'घास गोदाम' म हवै । जगदीश चन्द्र दिल्ली म रहत गांव के मनखे के सोसन अउ दु:ख-दरद ल भासा दिहिस । प्रस्तुत हे वोकर उपन्यास 'घास-गोदाम' के आखरी अध्याय के छत्तीसगढ़ी भासा म भावानुवाद ।

उपन्यासकार : जगदीशचंद्र
अनुवाद : नंदकिशोर तिवारी

  मनीराम सड़क म रेंगत जात रहै के फटफटी के अवाज सुनिस। रूक के पाछू कती देखे लगिस। फटफटी म चौखंडी के दूध बेचइया उदयचंद सवार रहै। फटफटी के दूनों कती लोहा के बड़े-बड़े ड_म बंधाय रहै। वोकर पाछू दू ठों छोटे ड_म घलो रहै। उदयचंद ल चीन्ह के मनीराम रूक गै।
मनीराम के लकठा म हबर के उदयचंद फटफटी ल रोक के अपन दूनों गोड़ ल भुइंया म राखिस अउ दूनों हाथ ल बढ़ात पूछिस 'का हालचाल हे मनीराम ?'
'ठीके', अंगूरी के भाई मुरझाय असन जवाब दिहिस।
'फैसला हो गे मुदकमा के ?'
'ह हो। चउदा साल के सजा होय हे' मनीराम बताइस।
'मोर तो खामपुर म रोज आना जाना हो थे। वो टूरेच् ह बदमास रहिस। वोला तो एक न एक दिन मरनेच्    रहिस। तोर भांटो के किस्मतेच् ह खराब हो ही, के खून पे  दोस वोला लगिस' उदयचंद कहिस।
'मोर बहिनी अउ भांचा मन के जिन्दगी बिगड़ गै। अंगूरी के भाई अउ मुरझाय असन कहिस, 'बांदरा के खाई वाला सेठ अब अपन दांव ल कसत हे। पहलाद संग वोकर लेन देन रहिस। पइसा नइ तौ घर मांगत हे। सोचत हौं के तातारपुर के रामसिंह संग बात करौं। सुने म आय हे के सेठ वोकर बात ल मान थे।
'जरूर मानत हो ही। हमर इलाका म वोकरे चल थे। नेताजी जउन बन गे हे। देख ले। किस्मत के खेल ये... तोर मोर करा आना दू आना मांगै।, बिड़ी पिये बर। अब बंगला बनवा डारे हे। मोटर म घूमथे। सुने तो इहां तक आ थे के नजफगढ़ म वोहा खातू अउ टे_क्टर के एजेंसी घलो ले लिहे हे 'उदयचंद बताइस। फेर कहिस, 'पइसा खाथे फेर काम घलो कर थे। उत्तम प्रकास के सेती थाना तहसील वाला मन घलो डेराथें।'
'अभी वोहा घर म होही न ?' मनीराम पूछिस।
'का पता ! दू घंटा पहिली गांवेच् म रहिस। सड़क तीर म ठाढ़े एक झन कार वाला संग गोठियात रहिस, उदयचंद बताइस।
'मोला वोकर गांव तक छोड़ दे 'मनीराम कहिस रेंगत जाय म समे लग जा ही।
'चल, फेर बइठे सकबे।... अपन गोड़ ल एक कती रख बे तौ बन जाही' उदयचंद पाछू कती टंगाय ड_म मन ल देखत कहिस।
मनीराम कसर-मसर करत कइसनों करके फटफटी म बइठ गै अउ उदयचंद ल रपोट लिहिस। थोकुन म तातारपुर पहुंच के रामसिंह के बंगला के सामने जा के खड़ा होइस। रामसिंह के कारन गांव म बिजली पहुंच गै    रहिस। गली मन पक्का बन गै रहैं। आने गांव म इन सबके योजना बनत रहै।
फटफटी ल गली म खड़ा करके, बंगला के भीतर गइन। एक आदमी कमरा ले निकलिस अउ उनमन ला बइठार के उंकर आय के कारन पूछिस अउ कहिस के साहब अभी मीटिंग म व्यस्त हे। वोहा पूछिस 'आप मन कहां ले आय हौं।'
'मैं चौखंडी के रहइया औं अउ ये हां तोखड़ी के, फेर आजकाल बसई- दारापुर म अपन बहिनी संग रहि थे'' उदयचंद बताइस।
'अच्छा-अच्छा ! पहलाद सिंह घलो उही गांव के रहइया ये, जउन बांदरा खुई के कतल केस म फंसे हे।'
'ह हो ये हा वोकर सारा ये' उदयचंद बताइस।
वो आदमती ह मनीराम कती धियान ले देखिस अउ अपन हथौरी ल रमजत कहिस 'साहब ह अड़बड़ेच मिहनत करिस के पहलाद सिंह ल कम से कम सजा होय। मोला लगथे के पहलाद सिंह ल फांसी नई होय हो ही। फइसला हो गे का ?
'हो गे। चौदा बरिस के सजा होय हे 'मनीराम बताइस वो आदमी ह एक पइत अउ अंगूरी के भाई मनीराम कती देखिस अउ कहिस 'अब का समस्या आ गे।'
मनीराम उदयचंद कती देखिस अउ फोर के अपन समस्या ल बताइस।
मनीराम के बात ल सुन के वो चुप पर गै। फेर मांगेराम वोला समझात कहिस 'मैं एक बात आप ला बतात हौं... साहब बाहरी आदमी के साथ, चाहे वोहा  कतको पहुंच वाला होय, कतको संगी सधाय, अपन अउ स्थानीय आदमी के दुस्मन मानथें। उंकर मुकाबला अपन आदमी के सहायता कर थे। उन कहि थे जब पंजाबी पंजाबी के सहायता करथें तौ हम काबर अपन आदमी के सहायता नइ करबो। उंकर संग हमर जिये मरे के सम्बन्ध हे। आप फिकर झन करौ... साहब आपके सहायता जरुर करिही।
थोरकुन म रामसिंह बाहिर ले आय आदमी मन ल बिदा करके अपन खोली म घुसर गै। बाहिरी आदमी मन के दिये रूपिया ल अलमारी म रख के, झक्क सफेदर् कुत्ता ल झर्रात मनीराम अउ उदयचंद के लकठा म आइस।
सबके हाथ जोर के छमा मांगत कहे लगिस उनमन बड़ बेरा ले लिन... ये दे एक घंटा के बादेच् मोला डी.सी. साहेब करा मिलना है।' 'फेर मांगेराम ल कहिस' एक ठन चिट्ठी लिख के टेलिफोन के अधिकारी ल मोर फार्म हाऊस म टेलिफोन लगाय बर बोल।
एक मिनट चुप रहिस फेर रामसिंह कती देख के कहिस 'आ जो सेंपल भरे हस जउन मोर सुरता आ गिस ?'
'नहीं गा, तोर रहत ले हमर सेंपल कइसे भरे जा ही। मैं तौ एकर संग आय हौं,' उदयचंद अंगूरी के भाई कती इसारा करत कहिस 'पहलाद सिंह के सारा मनीराम के संग।'
ये ला सुन के रामसिंह कुरसी म करवट बदलिस अउ पसर के बइठत कहिस 'का करिन भाई ! कोसिस तौ बहुत करेन। प्रधानमंत्री तक एप्रोच लगाएन, फेर अदालत के मामला टेड़गेच् हो थे' थोरकुन मुस्करात फेर कहिस 'मोर लाइक अउ सेवा बतावा। मैं तो यारों यार औं। पहलात हमर वो समे के यार ये जब मैं वोकर करा बिड़ी बर पइसा मांगौ। कभू-कभार मंद घलो पीयन। सही कहे म का के डर। वोकर मदद करना मोर फरज बन थे।'
मनीराम ह रामसिंह ल जमो बात ल बताइस। रामसिंह सोचिस अउ कहिस 'तैं फिकर झन कर। कोनों न कोनों रद्दा निकरही। सांप घलो मर जाय अउ लाठी घलो झन टूटै।
अब वोहा मांगेराय  ल देखत कहिस 'तैं फटफटी म जा के रामदयाल ल बला लान'
मांगेराम ल भेज के रामसिंह उदयचंद ल धियान ले देखिस अउ कहिस 'तैं तो कहे रहे दूध बेचइयाा मन के यूनियन बनाय बर। वोकर प्रधान मैं बनहूं। खंजाची ते बनबे। सेक्रेटरी के पद मांगेराम नइ त भालसिंह ल देबो। जल्दी कर नइ तौं जमों दूध बेचइया मारे जाही। भारत सरकार कती ले मिल्क सप्लाई स्कीम आवत हे। सुरता राखे रौ।
'सुरता हावै चौधरी फेर का करबे समेच् नई मिलै' उदयचंद ह सफाई देत कहिस।
''टाईम तौ मैं काल निकलवा दौं। कलेच् सेंपल भरवा लिये जाय तो टाइमेच् टाइम हे। 'फेर हांसत कहिस 'लगथे मोला इही करना परही। चौरस्ता म जम्मों दूध बेचइया मन ल रोक के सेंपल लेवाहूं अउ उंकर दूध के जबती करा हूं अउ फेर उहें उंकर मीटिंग करके यूनियन बनवा हूं।''
'नहीं गा ! दू चार दिन म मैं जम्मोच् इंतजाम कर देहूं' उदयचंद आस्वासन असन दिहिस।
बाहिर म फटफटी के अवाज सुन  के वोकर धियान वो कोती बइस। रामदयाल ल आवत देख के रामसिंह कहिस' 'आ गै मोटहा आसामी लाला।''
थोरकुन म मांगेराम के पाछू-पाछू रामदयाल आइस। रामसिंह के संग अंगूरी के भाई ल बइठे देख के रामदयाल के माथा ठनकिस। वो हा मने मन म निरनय कर लिस के या तो अपन रूपिया वापिस ले ही नइ तौ मकान के कब्जा।
कमरा म आ के रामदयाल रामसिंह के पांव परिस। रामसिंह घलाव वइसनहेच् वोकरइज्जत ण्च्चड्ड करत बइठाइस।
रामसिंह उदयचंद कती देखत कहिस 'उदयचंद अउ कुछू सेवा होय तौ बोल।'
'सब ठीक हे मालिक' कहत उदयचंद उठिस अउ संझा के दूध सकेले के बहाना करत रेंगे लगिस।
'मोर बात के सुरता राखे रहिबे। ज्यादा देरी होय म खराबी आ ही। रामसिंह चेतात कहिस 'मोर हाथ ले तीर निकर गै तौ फेर वापिस नई आय'
'आप फिकर झन करौ। दू तीन दिन के मोहलत अउ दौ' उदयचंद भरोसा देवाइस अउ कमरा ले निकर गै।
कुरसी म बइठत रामदयाल पूछिस 'मालिक मोला काबर बलाय हौ।'
'सेठ तैं येला जानथस न ?' रामसिंह अंगूरी के भाई कती इसारा करत पूछिस।
'हौ जी, पहलाद सिंह के फइसला के दिन घलो मैं इंकर संग अदालत म मौजूद रहेंव' रामदयाल अपनइती जतात कहिस।
'इंकर घर के समस्या हे' रामसिंह अइसे कहिस जनामना छोटे बात हो वै।
येला सुन के रामदयाल गंभीर हो गे अउ धीरे-धीरे कहना सुरू करिस 'नेता जी ! आप ला जमों बात के जानकारीहोबेच्च् ्रलउज्ञउज्ज्ऱ् करही। पहलाद सिंह उप्पर मोर पांच साढ़े पांच हजार रूपिया आ थे। उधार लेत खानी अपन घर ल गिरवी राखे रहिस। महूं गरीब आदमी औं, महू ल अपन लोग लइकन के पेट भरना हे। पहलाद सिंह बरी हो जातिस तौ वोकर करा हिसाब करतेंव, अब इन्ही मन करा निपटारा करना हे।'
'घर ले के तैं का करबे' रामसिंह पूछिस।
'अपन पइसा वसूले बर बेच दे हूं। नइ तौ खुदै रहे लग हूं। अउ कुछू नइ हो ही तौ किराया उठा दे हूं ं अब हमर गांव मन म घलो घर के किल्लत होत हे' रामदयाल कहिस।
रामसिंह के ओंठ हालिस। वोहा मुंड़ ल हलाय लगिस जनामना रामदयाल के गोठ ल अपन दिमाग म बइठारत होय। अनभोरहा असन रामसिंह अपन कुरसी ले उठिस अउ रामदयाल ल अपन पाछू आय के इसारा    करिस।
रामदयाल के कमरा म घुसरते रामसिंह दरवाजा ल बंद कर दिस। उन दूनों सोफा म बइठगैं। रामसिंह रामदयाल के आंखी म आंखी डार के उच्च आवाज म कहिस ताकि बाहिर म बइठे अंगूरी के भाई घलो सुनलै 'देख सेठ, तोर करा घर बेचे के सवाल पैदाच्च् नई होय। उहां रहे के बात ल तैं भुला जा। तैं नइ जानस के तुंहर बारे म हमर आदमी मन के का धार हे। अपन भुइयां म तुंहर हवेली उनला बरदास्त नइ होय। अपन घर ल तोला कइसे बेंच दैं।'' कहिके रामसिंह चुप पर गै, जनामना अपन गुस्सा ल सांत करत होय। फेर संयत हो के कहिस 'देख सेठ, तोर करा उधार लिहे पइसा जरूर तोला वापिस मिलही। आन कोनो होतिस तौ हो सकत हे पइसा वापिसे नइ होतिस। अब तैं अइसे रद्दा खोज के तोला घर बिसाय बर झन परै अउ पइसा घलो वापिस मिल जाय।
एक पइत रामदयाल गुस्सा म आ गइस फेर अपन आप ल संभालत कहिस 'नेताजी, जउन मोर समझ म आइस मैं कहेंव। अब आपे बताव कइसे करे जाय।
रामसिंह हुंकारु भरत सोचे लगिस। थोरकुन म कहिस 'तोर कतका पइसा बनथे'
पक्का हिसाब तौ खाता देख के बता सकत हौं। फेर अंदाजन पांच साढ़े पांच हजार होबेच्च् करहीं ?
'पहलाद के घर के कतका किराया मिलही' ? रामसिंह पूछिस।
'डेढ़ सौ तक मिल जाही'
'किराया कोन लिही'
'हमर कंपनी के कालोनी ले लेबर ठेकादार के मैनेजर हवै न'
'मैनेजर कोन ये'
'कोनों पूरब के मनखे ये। नांव तौ मैं नइ जानौं। भला आदमी असन लागथे। ओकर एकझन बूढ़ी दाई, डउकी अउ दू झन लइका हे' रामदयाल बताइस।
'ठीक हे। कोनो ल दे तैं' रामसिंह अपन फइसला सुना दिस।
'ठीक हे मालिक' रामदयाल हाथ जोर लिस।
'अब हिसाब लगा के तोर पइसा कतका दिन म वसूल हो जा ही। ब्याज के बिना अउ ब्याज ल जोर के रामसिंह कहिस।
रामदयाल हिसाब लगा के कहिस 'किराया के बरिस भर म अट्ठारह सौ रूपिया हो ही। असल पूरा हो जाही तीन-चार बरिस म। बियाज डेढ़ रुपिया सैकड़ा हो ही। तौ दू साल अउ लग जाही। ये तरा छै-सात साल लगबेच् करही।'
'अउ पहलाद नौ दस साल के पहिली नइ आवै। किराया घलो बाढ़त जाही...' कहत रामसिंह मने मन म हिसाब लगावत रहै।
वोहा रामदयाल कती देखत कहिस 'सेठ, मोर काम अड़बड़ेच बाढ़ गै हे। सोचत हौं के एक ठन जीप बिसा लौं। दू चार ठो देखे घलो हौं। एक दू दिन म सौदा पट जाही।'
'कतका म सौदा पट जाही' रामदयाल पूछिस 'मालिक दस हजार मांगत हे। फेर आठ के आजू-बाजू सौदा हो जाही। नइ करही तौ मैं करवा ले हूं। रामसिंह मुस्कात कहिस फे र एकाएक गंभीर हो के कहिस 'एकर बर तैं चार हजार मोला दे बे... दू अपन खाता ले... अउ दू पहलाद के खाता ले। तीन साल म तोर पइसा बियाज सहित वसूल हो जाही।
'मालिक रकम ज्यादा हे' रामदयाल हाथ जोरत कहिस
'देख सेठ, मोर हिसाब कभू गलत नइ हो वै। तोर दुकान के मामला घलो ल ठीक करवाना हे। ठीक नइ होही तौ कारपोरेसन वाला मन कोनो दिन आ के गिरवा दे हीं। मलवा तक नइ मिलही तोला।'' रामसिंह आंखी ल तरेरत कहिस।
'जइसे आपके मरजी' रामदयाल हाथ ल खींजत कहिस।
'ठीक, अब सौ संगी बनिन तौ दस दुस्मन घलो बन गैं। उंकर ले बाहंचे बर एक ठों बंदूक घलो चाही। एकर बर एक हजार रुपया तैं अलग दे बे। लासेंस मैं बनवा लिहे हौं। कहिके रामसिंह फाटक खोलिस अउ अंगूरी के भाई ल इसारा करके अपन तीर बलाइस। कमरा के भीतर आय के बाद फाटक बंद कर दिस।
जमों झन चुपचाप रहिन। रामसिंह मनीराम कती देखत कहिस 'देख भाई ! पहलाद सिंह बने- मइहन जउन करिस अब वोला तिखारे ले कुछू नइ होय। समस्या घर के हे, काबर के तोर बहिनी उधारी ल चुकाय तौ सकै         नहीं। सोच विचार के हमन रद्दा निकाले हन के नौ बरिस बर घर ल रामदयाल सेठ ल दे दिये जाय। किराया वसूल के अपन पइसा के भरपायी कर लिही। वोकर बाद घर पहलाद के घरवाली मिल जाही। वोहा वोमा रहै के किराया म दै, वोकर मरजी। अउ कहूं पहलाद ये बीच जेल ले छूट के आ जाही तौ सेठ तीन महीना म घर खाली कर दिही अउ बांचे-खुंचे हिसाब ल करही। कइसे मंजूर हे न ?
अंगूरी के भाई कुछू उत्तर नइ दिस तौ रामसिंह जंगात कहिस 'मंजूर नइये तौ तैं जान अउ ये सेठ जानै।'
'ये बीच म अंगूरी कहां रहिही' मनीराम डर्रात पूछिस।
'तैं अपन गांव ले जा, अउ इहां रहना हे तौ बेवस्था कर' रामसिंह सुझाइस।
'मैं बेवस्था कर सकतेंव तौ इहाँ काबर आतेंव, हा ? गांव ले जा सकत हौं फेर वोकर करा पूछना परही' मनीराम कहिस।
'पूछ ले। फोकट म इहां तौ झुग्गी झोपड़ी म घलो जघा नइ मिलै। दू सौ रूपिया जघा दे हे के नांव म ठेकेदार लिही। दस रूपिया महीना किराया अउ झोपड़ी बनवाय के खर्चा अलग' रामसिंह कहिस।
'गांव के तीर तखार म झुग्गी मिल जाही ? मनीराम पूछिस।
'हां-हां, नरवा के दूनों कती पांच सौ के लकठियात झुग्गी हवै। उहां भूती घलो मिल जाही। गांव गिराम के डउकी मन कंपनी के कालोनी अउ सरकारी निरमान म काम करत हें। सरकारी भूती पांच रूपिया रोज के हे। बिहनिया आठ बजे ले छै बजे संझा तक काम करना परथे। बीच म दू घंटा खाय-पिये बर छुट्टी घलो मिल थे ' रामसिंह कहिस।
फेर मांगेराम ल बला के कहिस 'मांगे राम ! एक झुग्गी बनवाना हे। ठेकेदार करा बात करके बने जघा बनवा देबे। कम से कम बनउनी लिही, चेता देबे अउ कहिबे के बनउनी सेठ रामदयाल करा ले ही। कइसे सेठ जी।'
'आप मालिक हौ नेताजी' रामदयाल हाथ जोर के कहिस।
रामसिंह मनीराम ल फेर कहिस' तैं सेठ करा इकरारनामा कर ले। मांगे राम के संग जा के झुग्गी के जघा देख ले। जउन खरचा हो ही सेठ दिही। सौ पचास के जरूरत हो ही तौ वोहू ल ले लेबे। ठेकादार ल कहिके सेठ तोर बहिनी ल मजूरी घलो देवा दिही। मेहनत करके अपन पेट ल भरै। न कोनों के लेना न  कोनों के देना... अउ कुछू बात होय तौ मोर करा आ जाबे।
रामसिंह अपन बात खतम करके उठिस अउ अपन घर के भीतर निंगगै।

 

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