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देवता मन के भुतहा चाल
- केयूर भूषण
गंवई के रहइया मन ल शहर वाले मन बहुंत हिनथें। अपन ल देवता कईथे अउ गांव के रहईया मन ल भुतहा। मोर फूफूदाई शहर म रहय तेनह अपन मईके आवय तव मोर दाई ल, जेन ओखर भउजी ए, तेखर मेर बहुंत ठट्ठा मढ़ावय। ते बखत कहय- ''भउजी तूमन गंवई म भूत बरोबर रईथव ओ'' बिहनिया ले घर लिपथव, कोठा गोर्रा के गोबर हेरथव, भंड़वा मांजथव, फेर पानी भरके, हंसिया धरे निंदे कोड़े बर जाथव। चिखला म सदबदा ए रथव। कुटथव, छरथव, तव कहूँ खाए बर पाथव। हम शहर के रहइया मनके न हांत मईल, न गोड़ मईल, छनछन ले घर दुवार, जेमा फर्रस के पथरा लगे। ओला न लिपेबर परय न अउंठियाए बर। झर-झर ले पानी म धो पोंछ ले। झक-झक ले दिखे लगथे उज्जर। कुटे छरे के कामे नई रहय। बिसा के ले लान पईली भर चांउर। ओला एक पानी धोके सोझे ओईर दे। दगदग ले भात। थारी म निकाल के खाले परोसा परोसा। नौकरिहा अस तव तैं अपन नौकरी ले दिन बुड़े के पहिली, डांग भर बेरा रहिते घर आजा। गिंजरे के मन होय तव गिंजरत रह रात ले। सिनेमा देखे बर जा, के बगईचा म ंगिंजर ले। नहिंतव कोनो क्लबम जाके, कोनो तोर मसखरी करे के नतादिष्टा होय के झन होय, ओला धकिया के ओखर संग धींगा मस्ती करले। तोला कोनो किसम के लदा-धक्का नई लगना ए। न तोला कोनो छेंकय न बरजंय। भंवरा असन एक फूल ले दूसर फूल सुंघत गिंजरत रह।
फुफु कहय-''शहर के रहइया मन देवता बरोबर रथन भउजी'' तुंहर सही गोबर चिखला म सदबदाए ए जिंदगी नई पहावन। उंखर अईसना गोठ ल लईकई म सुनन, तव हमरो शहर जाए के मन होय। गुनन शहर के रहइया देंवता मन संग हमू दूचार दिन रहि लेतेन। कभू तो शहर देखे नई रहेन। अपन दाई सो शहर जाए के रटन लगादेन। कहेन दाई, एदारी फुफु आही तेखर संग हमू शहर देखे बर जातेन ओ। दू चार दिन हमू शहर के देंवता मन संग रहिलेतेन। ते ठउंका तीजा पोरा लगाती फुफु अपन मईके 'हमर घर' आतो गय। तेह भाई दुईज के होए उपर ले अपन घर गेईस। तव हमू दाई मेर रेंधिया के फुफु संग ओखर घर शहर चल देन।
ठंउका मोटर ले उतरते शहर ल जगर मर देखके, अकबका गेंव। चिंक्कन चांदन सड़क, बड़े दुकान तेमन म रकम-रकम के जिनिस। कोनो म रिंगिचिंगि ओढ़ना सजे। तव कोनो म नानम परकार के खाई खजेना। देखते ओखर डहर मन झिंकाएअस लागय। फु फु दाई संग, रकसा गाड़ी म बईठ के ओखर घर पहुंचेंव। आदमी ल बईठार के आदमी झिंकय अईसना गाड़ी म पहिली बेर बइठेंव। मैं तो गंवई गांव के रहइया। उहां बइला गाड़ी, भईसा गाड़ी, घोड़ा गाड़ी म चढ़े रहेंव। रकसा गाड़ी म कभू नई चढ़े रहेंव। पहिली तो मनखे फंदाए गाड़ी उपर बईठब म कनुवाएवं। फेर देवता मनके शहर के एही चलागत होही गुनके बईठबे करेंव।
मोटर के चढ़े उपर ले शहर के आवत ले कोनो मेर पिसाब करे के मौका नई लगे रहिसे। घर पहुंचते पिसाब करेके मन होइस। तंव मैं आते उहां कोला- बारी खोजे लगेंव। कहां मिलय उहां कोलाबारी। तव फुफु मेर पूछेंव कोला कोन मेर हे फुफु मुतुलागथे। तव ओह बताथे तोर गंवई गांव सही इहां कहां पाबे कोला-बारी बेटा- ''ए दे खोली देखथस न तेही ह दिशा-मैदान के जघा ए। उहें जा। अउ ओखर बाहीं म खोली हे न, तेह नहाएं के कुरिया ए। उहां जा के हांत गोड़ धो लेबे। एला पयखाना कथें अउ ओला नहानी कुरिया। कोनो किसम ले निपटेंव भाई, ओही कुरिया मन म।
थारके म दिन बुड़तहूं होगे, आगी बारे के बेरा । तव मोर फुफु ओही पयखाना अउ नहानी के बाहीं के कुरिया म खुसर के आगी बारे के जोंखा मढ़ाए लगिस। ओही ओखर रंधनी कुरिया रहय। उहां कनिहां के आवत ले उंच पैठा जुगुत रहय। तेमा एक ठिक टिन के पाटा म दूठक चक्की असन रहय। ओखर ले तिरियाती खाल्हे म माढ़े रहय बम्बा असन कोठी। तेमा ले एक ठन रबर के पोंगरी ओ पाटा म जुरे रहय। ते मोर फुफु ह दूनो चक्क्ी अउ कोठी म लगे ओखर कान मन ल अईंठ के ओ चक्क्ी मन म डब्बी कांड़ी ल बार के छुवादिस। तव दुनो चक्की ह, चुलहा कस, अउल बरे लगिस। तेमा के एक अउल म चांउर धो के चढ़ा दिस अउ दूसर अउल म करइहा म तेल डार के साग भुंजे लगिस। ठंउका कहे रहिसे फुफु दाईह ''हांत मईल न गोड़ मईल। अंधना आगे, भात चुरगे'' तव गुने लगेंव सहिंच म शहर मनम देंवता मन बसथें। उनला चिखलाए के कामे नई रहय।
फेर हां जो बखत के ओखर एक ठी गोठह मोला भदेसिल ला गिस जी। ओह आय मोर फुफुदाई के बिगर हांत गोड़ धोए, जे लुगरा ल पहिरे गांव ले आए रहय, तेने लुगना ल पहिरे के पहिरे अलगा घलो ल नई उतारिस, सोझे खुसरगे रंधनी कुरिया म। उहां जा के रांधे ल धरलिस। मोला धिनधिनासी लागे लगिस जी। तहीं बताना ओही अलगा ल पहिरे के पहिरे, मुंढर घर म खुसरगे। परदे आड़ तोहे, रंधनी कुरिया अउपयखाना के बीच म। कइसे उनला सुहाथे तेला उनहीं जानंय। गंवई गांव म अईसना करतिन तव उनला गांव भर के मनखे, थुवा-थुवा कर डरतिन। शहर आय तव बांचगें।
रात होते फूफा संग बियारी करे बर बईठेव। न हांत धोए बर कहिन न गोड़ धोए बर। न कोनो एक लोटा पानी लान के देइन। न पीढ़ा पानी भरिन। फूफा हतो ओइसने के ओइसने पनही मोजा पहिरे के पहिरे खुरसी टेबुल म आके बईठगे। मोला शहर के देंवता मनके सब गोठ अकबकउल लागथे संगी।
रात तो बने कटिस। मोर फुफु दाई मोला बेरहन लईका ले लानेहंव गुनके, बने मया लगाके सुपेती संग मुड़सरिया लगाके, जाड़ झन पावय गुनके, बेलांकिट ओढ़ा के सुतादिस। मंजा के नींद परिस भाई। फेर मोर अपन गांव मं भिनसरहा लेउठे के टकर रहय। गरूवा ढिल के दुहानी मन ल हटिया के चराए के मोरे बूता रहय। ते इहों भिनसरहा उठगेंव। फुफु घलो भिनसरहा ले उठ गेए रहय। ओखरो तो गंवईच के उपजज बाढ़न ए। भले ओटेम फूफा के नाक बाजत रहय। मोला जागत बईठे देख के फुफु कइथे- ''तोर मन होय तव सड़क के जात लें गिंजरिया बेटा'' ते महूं शहर के सड़क ल देखे के मन करके निकरेंव। घर कुरिया मनल नहंकत सड़क म आगेंव। तव शहर के सड़क म का देखथंव ''हमर गांव कस इहां कोनो गाय भईसी चराए बर नई निकरें यें। फेर कतको झन डउकी-डउका मन कुकुर के गर म संकरी बांधे ओला चराए बर निकले हें। अईसना कुकुर मन ल चरावत मैं अपन गांव म कभू नई देखे रहेंव।
थोरके म कईझन ल दरबर दरबर जात देखेंव। तेमा के कोनो-कोनो तो दंउरत रहंय। पहिली तो मैं डेरागेंव। कोनो के होबा जाबा तो नई लगे होहय। तेखर धांवा आए रहिस होहय। तेखर सेती दउंरत लगर धकर जात होहंय। तव ओही मेर एक झन गिंजरत रहय तेला पूछेंव- ''का होगे हे जी, तेखर बर दंउरथें।'' तव ओह मोर डहर देखके हांसथे अउ पूछथे- ''तैं कोनो गंवई गांव ले आए हस काजी'' मोर हहो कहे उपर ले कइथे- 'शहर म सब झन अइसने हवा खाए ल टहले बर जाथें जी। अउ काम बूता नई रहंय तेपा के कतको झन, खाए रथें तेला पचोए बर दंउरथें घलो।''
तव मैं गुने लगेंव 'शहर म आए हंव तेन दिन ले मोरो काम बूता छूट गेए हे। दू चार दिन इहां रहिजहंव तव मोरो पेटपिरि झन उठजय। मोला अब घर जाना चाही। गुनके मैं अपन फुफु सो कहेंव-'मोला मोटर म बईठार के गांव भेज देते फुफु। इहां मोला अकबकउल लागथे।' अपन गांव तिर म उतर जहंव। शहर के देवता मन के संग के रहई ह मोला भावत नई ए। इहां खेत न खार, न हमर गांव कस हवा पानी, इहां तो मोला धंधाए अस लागथे। जादा दिन रहिजहंव तव बईठ के खवई म बिमार झन परजांव। मोला शहर सुहात नईए।
मोर फुफु दाई के मोटर म बईठारे उपर ले पहुंचि आ एवं अपन गांव। अपन गांव अपने होथे, बड़ मेयारूक। मोर गांव मोला बिन्दावन अस लागथे। अतके म मोर कान म ददरिया के टेही परे लगिस। गेवार के बंसरी के धुन सुनाए लगिस। करमा, सूवा, पंथी के थाप ह मन ल झिंके लगिस। तव गुने लगेंव- 'मोर फुफु दाई ह मईके आथे तब अपन भउजी ल कुड़काए बर कथे ''शहर बसे देवा नांग-गांव बसे भूता नांग'' तेह उलटा अस लागथे। शहर देखे उपर ले।
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